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बनकर के इंसान जगत में

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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बनकर के इंसान जगत में, अपना नाम कमाओ।
मानव हो मानवता रक्खो, मानव धर्म निभाओ॥

कर्म निरंतर करते रहना,
है कर्तव्य तुम्हारा
बिन लहरों का किये सामना,
मिलता नहीं किनारा।
पार करो जीवन सागर तुम, डूब कहीं नहिं जाओ,
बनकर के इंसान…॥

नही मिलेगा कोई तुमको,
साथ निभाने वाला
दुनिया के झंझावातों से,
सदा पड़ेगा पाला।
कदम कहीं रुकने नहिं पाये, आगे बढ़ते जाओ,
बनकर के इंसान…॥

विपदाओं का करो सामना,
अडिग रहो पर्वत से
कांटे हों, पथरीली राहें,
पार करो हिम्मत से।
बाज बनो विस्तृत नभ में जा, कर परवाज़ लगाओ,
बनकर के इंसान,..॥

दुनिया में आकर के अपना,
ध्येय भूल मत जाना
अहँकार अभिमान हैं दुश्मन,
दूरी सदा बनाना।
सब अपने हैं नहीं पराए, सबको गले लगाओ,
बनकर के इंसान…॥

छोटा-बड़ा, ऊँच अरु नीचा,
समझो सदा बराबर
लाल रंग का लहू सभी में,
व्यर्थ न करो बहाकर।
ईश्वर अल्लाह एक हमेशा, सबको ये समझाओ।
बनकर के इंसान…॥

बनकर के इंसान जगत में, अपना नाम कमाओ,
मानव हो मानवता रक्खो, मानव धर्म निभाओ॥

परिचय–शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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