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मन की शक्ति

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।
मन में दृढ़ संकल्प हो,बने वही फिर मीत॥

मन तो एक तरंग है,बहता है दिन-रात।
रुके नहीं रोके कभी,बनती कैसे बात॥

पंछी जैसी चाल है,करे नहीं आराम।
मन ऐसा है बावरा,फिरता सुबहो-शाम॥

मन चंचल तन सारथी,चलते हैं दिन रैन।
रोके से भी ना रुके,ना ही उसको चैन॥

बँधे नहीं ये डोर से,बाँधो कितनी बार।
ना वश में रहता कभी,उड़ता पंख पसार॥

मन की शक्ति अपार है,मन से बड़ा न कोय।
मन ही ताकत जीव की,मन का सोंचा होय॥