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माँ…मजबूत कंधों का नाम

गोपाल मोहन मिश्र
दरभंगा (बिहार)
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माँ संवेदना है, भावना है, अहसास है
माँ जीवन के फूलों में ख़ुशबू का वास है।

माँ रोते हुए बच्चे का ख़ुशनुमा पलना है,
माँ मरुथल में नदी या मीठा-सा झरना है।

माँ लोरी है, गीत है, प्यारी-सी थाप है,
माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है।

माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है।

माँ झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,
माँ मेहंदी है, कुमकुम है, सिंदूर है, रोली है।

माँ क़लम है, दवात है, स्याही है,
माँ परमात्मा की स्वयं एक गवाही है।

माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है,
माँ फूँक से ठंडा किया हुआ कलेवा है।

माँ अनुष्ठान है, साधना है, जीवन का हवन है,
माँ ज़िंदगी के मुहल्ले में आत्मा का भवन है।

माँ चूड़ी वाले हाथों के मजबूत कंधों का नाम है,
माँ काशी है, काबा है और चारों धाम है।

माँ चिंता है, याद है, हिचकी है,
माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है।

माँ चुल्हा-धुआँ-रोटी और हाथों का छाला है,
माँ ज़िंदगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है।

माँ पृथ्वी है, जगत है, धुरी है,
माँ बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है।

माँ का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता,
माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता॥

परिचय–गोपाल मोहन मिश्र की जन्म तारीख २८ जुलाई १९५५ व जन्म स्थान मुजफ्फरपुर (बिहार)है। वर्तमान में आप लहेरिया सराय (दरभंगा,बिहार)में निवासरत हैं,जबकि स्थाई पता-ग्राम सोती सलेमपुर(जिला समस्तीपुर-बिहार)है। हिंदी,मैथिली तथा अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले बिहारवासी श्री मिश्र की पूर्ण शिक्षा स्नातकोत्तर है। कार्यक्षेत्र में सेवानिवृत्त(बैंक प्रबंधक)हैं। आपकी लेखन विधा-कहानी, लघुकथा,लेख एवं कविता है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। ब्लॉग पर भी भावनाएँ व्यक्त करने वाले श्री मिश्र की लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक- फणीश्वरनाथ ‘रेणु’,रामधारी सिंह ‘दिनकर’, गोपाल दास ‘नीरज’, हरिवंश राय बच्चन एवं प्रेरणापुंज-फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शानदार नेतृत्व में बहुमुखी विकास और दुनियाभर में पहचान बना रहा है I हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान की प्रबल धारा बह रही हैI”

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