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मेरी माँ

विनोद वर्मा आज़ाद
देपालपुर (मध्य प्रदेश) 

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मातृ दिवस स्पर्धा विशेष…………


बेटी का जन्म होता है तब उसको कई रिश्ते मिलते हैं। भुआ,भतीजी,बहन…जब बड़ी होती है शादी होती है,तो बहू और पत्नी नाम मिलता है। ईश्वर ने महिला के रूप में एक अदभुत रचना की है। बाहर से कमजोर और मन से मुलायम के साथ ही यह कठोर भी होती है। महिला की शक्ति उसके आँसू होते हैं।सुख में भी बहते हैं तो दु:ख में भी। कभी आँसू बहाकर जीतती है तो कभी आँसूओं के समय ढेर हो जाती है। एक बहू-पत्नी के रूप में कहीं सराही जाती है तो कहीं बुराई भी सहन करना पड़ती है। शादी के बाद घर-परिवार के प्रत्येक सदस्य को खुश रखने के लिए कई जतन करना पड़ते हैं। फिर एक खुशहाली का पल आता है,जब पूरे परिवार के कानों में अदृश्य भाव किलकारी के रूप में गूंजने लगते हैं। जब बच्चा जन्म लेता है तब केवल बच्चे का ही जन्म नहीं होता,बल्कि अभी तक पत्नी,बहू की भूमिका करने वाली महिला माँ के रूप में जन्म लेती है। यहां से उसकी जिम्मेवारी बढ़ जाती है। अब नए दायित्व के तहत माँ की महत्वपूर्ण भूमिका की शुरुआत भी होती है। पल-पल उसे निहारना,उसका अक्स देखकर कल्पना करना कि यह किस पर गया है या गई है। बिस्तर बार-बार गीला करना,उसका रोना,मल साफ करना यह कार्य शुरू हो जाते हैं। हम ६ भाई-बहन थे,एक सबसे बड़ी व एक सबसे छोटी बहन,बाकी चार भाई,चूंकि बड़ी बहन और बड़े भाई पर परिवार की जिम्मेदारी घर के कामकाज से लेकर बाजार से सामान लाने तक की होती है। साथ ही कुछ- कुछ ज्ञान परिवार की आर्थिक दशा का भी हो जाता है। पिताजी शिक्षक हुआ करते थे। जोरदार हिंदी-गणित के साथ कठोर अनुशासन उनकी पहचान थी। गूंगे बच्चे भी बोलना शुरू कर देते थे। वो एक कहावत का इस्तेमाल हमेशा किया करते थे-“छड़ी पड़े छम-छम,विद्या आवे घम-घम।” पहले गुरु माता-पिता होते हैं,सो उनके नक्शे कदम पर बच्चे चलने का प्रयास करते हैं। पिताजी को बहुत कम वेतन मिलता था,उसमें घर का गुजारा नहीं हो पाता था। हमारे शौक तो हमेशा हवा होते थे।महीने की पहली तारीख को २,३ या ५ पैसे पिताजी से मिला करते थे जो हम माँ को देकर कहते “ले बइ पैसा रख ले,मामाजी का यां चलांगा तो खर्चो करांगा। अत्यधिक गरीबी अवस्था में बईं की आँखों में आँसू आ जाते,इन भावों के साथ कि मेरे बच्चे कितने मासूम और मजबूर हैं। कितनी आगे की सोचते हैं। माँ को बच्चों के मन के भावों को समझते देर नहीं लगती। सुबह बाई कुछ मोहल्ले की महिलाओं के साथ जंगल गई,लौटी तो खजूर के टापलिये,लम्बी-लम्बी लकड़ियों का बड़ा-सा गट्ठर बांध कर सिर पर रखकर लायी। जलाऊ लकड़ी खरीदना पड़ती थी,सो माँ ने सोचा पैसे बचेंगे तो बच्चों के काम आएंगे। प्रतिदिन यह सिलसिला चलने लगा। बरामदा खुला था बाहर बैठने की जगह नहीं थी,सो बई-बाबूजी हमको साथ लेकर तालाब पर गए जो सूखने के कगार पर था। वहां डोंगला काटकर कुछ बाँस का इस्तेमाल कर एक झोपड़ी बना ली। बैठने की जगह के साथ बारिश में घर में पानी न घुसे,ऐसी व्यवस्था की गई। मेरी एक मौसी रेडीमेड कपड़े बेचने का काम करती थी। उनकी देखा-देखी बाई ने भी रेडीमेड कपड़े बेचने का काम शुरू किया। बस से जाना ,सफर २० से ४० किलोमीटर तक का हो जाता था,बस गांव-गांव जाकर किसी को भाई बना-कर,किसी से बड़ी बहन का रिश्ता जोड़कर अपने व्यापार को बढ़ाना शुरू किया। धीमे-धीमे आय बढ़ने लगी,हमारी पढ़ाई और कक्षा भी बढ़ती गई। फिर भी हमारी विद्यालय की वेशभूषा खाकी पेंट और सफेद शर्ट की व्यवस्था नहीं हो पाई थी,पुरानी पेंट पीछे से फट गई थी,उस पर तिकोना खाकी कपड़ा लगवाकर हल्के सफेद शर्ट पहनकर विद्यालय जाते। कभी-कभी अनुशासन प्रिय व्याख्याता शंकरदयाल सिन्हा जी प्रार्थना से बाहर कर देते थे। केवल एक ड्रेस नए कपड़ों में उच्च परीक्षा पास की। हम २ भाई-बहनों ने सिलाई सीखी बहन की शादी के बाद बड़े बेटे ने ब्लाउज, पेटीकोट,सलवार सूट सिल-सिलकर आय बढाई। हमें रात्रि में कभी माँ से तो कभी दादी से शिक्षाप्रद और संस्कार मिलने वाली कहानियां सुनने को मिलती। अब बाई ने गांव-गांव जाना छोड़ दिया,केवल हाट-बाजार में दुकान लगाना शुरू की। एक शानदार पेंट-शर्ट बाई ने सिलवाया। बड़े बेटे ने गणित विषय से ११वीं बोर्ड परीक्षा विद्यालय में सबसे ज्यादा अंकों से उत्तीर्ण की। पॉलिटेक्निक की संध्या समय पाली में डिप्लोमा के लिए चयन हुआ,साथ ही आईटीआई.में भी ३ आवेदन(हिंदी आशु लिपि ड्राफ्ट्समैन सिविल और मेकेनिकल) में चयन हो गया। पिताजी को जब बताया तो उन्होंने कहा बेटा-“७५० रुपया वेतन मिलता है और बड़े शहर में एक व्यक्ति का खर्च ४५० लगभग होगा इसलिए मैं ३०० में घर कैसे चला पाऊंगा।” बस सारे अरमान धनाभाव में बह गए। बड़े बेटे ने अपने कवि मित्र बड़े भाई हेमराज वर्मा (बैंकर) की मदद से बैंक में अस्थायी नौकरी ७१ दिन के लिए ५९२.०२ पैसे में करली,छोटे बेटे ने प्रारम्भ में आर्मी में जाने की सोच बनाई,खूब मेहनत की। ताऊजी बीएसएफ में नौकरी करते थे,उन्होंने सारे तरीके सेना में भर्ती होने के बताए। भाई ने उसी अनुसार मेहनत की और आर्मी में तोपची का पद प्राप्त कर हैदराबाद के लिए मेरी नई वेशभूषा लेकर रवाना हुआ। एक वर्ष बाद बड़े बेटे को भी शिक्षक भर्ती परीक्षा में सफलता मिली। फिर शादी और चला सिलसिला प्रगति का। माँ सतत ईमानदारी से काम करने को प्रेरित करती रही। अब एक दुकान किराए पर ले ली,वहीं से व्यापार चलने लगा। बाई अब मन की बात करने लगी थी,कहने लगी-“माँ का जीवन पति के साथ तो लगा रहता है,पर बेटे के साथ के बिना अधूरा होता है। दुनिया में कौशल्या जैसी माँ हुई है,और दशरथ जैसे पिता जिन्होंने पुत्र वियोग में प्राण तज दिए। मैं भी एक माँ हूँ और चाहती हूँ मेरे बेटे मुझसे दूर न रहे। शादी के बाद भी मैं अपने बेटे-बहू और परिवार से कभी दूर न रहूं। इसी दौरान एक दुःखद घटना परिवार में घटती है। काकी माँ ६ माह के बच्चे को छोड़ दुनिया से कूच कर जाती है। प्रारम्भ में कुछ ठीक चलता है। माँ कुछ दिनों के लिए देवरानी के घर जाती है। ६ माह का बालक २ वर्ष का हो जाता है। दूसरी माँ के एक चांटे ने बड़ी माँ को उद्धेलित कर दिया। वह उस बच्चे को साथ ले आती है और परवरिश के लिए अपने पास ही रखने का परिवार में जिक्र करती है। उस छोटे से बच्चे की मानसिक दशा से परिवार को दु:ख होता है। अब उस बालक की परवरिश पूरा परिवार करने लगता है। माँ सतत अपनी निगरानी उस नन्हें बालक पर रखती है। धीमे -धीमे परिवार प्रगति पथ पर अग्रसर होता है। माँ हमेशा सभी भाई-बहनों को अपने संस्कारों में बांधे रखती है। फोटो स्टूडियो, जनरल स्टोर,रेडीमेड शॉप के साथ-साथ राजनीति में भी दखल बढ़ गया। माँ नगर परिषद में पार्षद चुनी गई,वही छोटा नन्हा बालक राजनीति के अहम पायदान पर पहुंच गया। सुख का वक्त जब आया,तब बीमारियों ने माँ पर घेरा डाल दिया। पन्द्रह-पन्द्रह दिन आईसीयू में भर्ती करना पड़ाl डेढ़ वर्ष में ६ बार सारी जेबें खाली हो गई,दुकानदारी अस्तव्यस्त हो गई। इलाज के लिए भी धन की व्यवस्था में परेशानी आने लगी। जब अस्पताल से छुट्टी हुई तो बाई पलंग पर लेटे-लेटे गले मे बाँहें डाल कहने लगी-“बेटा मैं बहुत साल सबका साथ रूँगा। मैं मरूंगा थोड़ी और हाँ,कभी म्हारे कय हुई जाय तो सब भाई होन को ध्यान रखजे और इना छोटा-सा पसुडा को पुरो ध्यान रखजेl ने इको ब्याव खूब धूमधाम से करजे।” माँ की मन की बात सुनकर संकल्प लिया और उसी रात पुनः माँ बीमार हुई और दीपावली के दिन परिवार को अंधेरी रात में छोड़कर नियति के काल चक्र में समाहित हो गई,ऐसी थी प्यारी माँ…l

परिचय-विनोद वर्मा का साहित्यिक उपनाम-आज़ाद है। जन्म स्थान देपालपुर (जिला इंदौर,म.प्र.) है। वर्तमान में देपालपुर में ही बसे हुए हैं। श्री वर्मा ने दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर सहित हिंदी साहित्य में भी स्नातकोत्तर,एल.एल.बी.,बी.टी.,वैद्य विशारद की शिक्षा प्राप्त की है,तथा फिलहाल पी.एच-डी के शोधार्थी हैं। आप देपालपुर में सरकारी विद्यालय में सहायक शिक्षक के कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत साहित्यिक,सांस्कृतिक क्रीड़ा गतिविधियों के साथ समाज सेवा, स्वच्छता रैली,जल बचाओ अभियान और लोक संस्कृति सम्बंधित गतिविधियां करते हैं तो गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षण सामग्री भेंट,निःशुल्क होम्योपैथी दवाई वितरण,वृक्षारोपण,बच्चों को विद्यालय प्रवेश कराना,गरीब बच्चों को कपड़ा वितरण,धार्मिक कार्यक्रमों में निःशुल्क छायांकन,बाहर से आए लोगों की अप्रत्यक्ष मदद,महिला भजन मण्डली के लिए भोजन आदि की व्यवस्था में भी सक्रिय रहते हैं। श्री वर्मा की लेखन विधा -कहानी,लेख,कविताएं है। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचित कहानी,लेख ,साक्षात्कार,पत्र सम्पादक के नाम, संस्मरण तथा छायाचित्र प्रकाशित हो चुके हैं। लम्बे समय से कलम चला रहे विनोद वर्मा को द.साहित्य अकादमी(नई दिल्ली)द्वारा साहित्य लेखन-समाजसेवा पर आम्बेडकर अवार्ड सहित राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा राज्य स्तरीय आचार्य सम्मान (५००० ₹ और प्रशस्ति-पत्र), जिला कलेक्टर इंदौर द्वारा सम्मान,जिला पंचायत इंदौर द्वारा सम्मान,जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा सम्मान,भारत स्काउट गाइड जिला संघ इंदौर द्वारा अनेक बार सम्मान तथा साक्षरता अभियान के तहत नाट्य स्पर्धा में प्रथम आने पर पंचायत मंत्री द्वारा १००० ₹ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही पत्रिका एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित हुए हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-एक संस्था के जरिए हिंदी भाषा विकास पर गोष्ठियां करना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा के विकास के लिए सतत सक्रिय रहना है।