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लघुकथा का सृजन कठिन-प्रो. खरे

मंडला (मप्र)।

इस लघुकथा सम्मेलन में पढ़ी गई २ दर्जन लघुकथाओं में व्यंग्यात्मक एवं गहन चिंतन का दर्शन होता है। लघुकथा कहने को लघु होती है किंतु लघुकथा का सृजन कठिन है। कविता की तरह लघुकथा को भी सपाटबयानी से बचनी चाहिए।
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में ऑनलाइन लघुकथा सम्मेलन में यह विचार
अध्यक्षीय टिप्पणी में राष्ट्रीय साहित्यकार प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे ( मप्र) ने व्यक्त किए। संचालन करते हुए संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने कहा कि,
लघुकथा में एक ओर व्यक्ति और समाज के द्वंद की अभिव्यक्ति रहती है तो दूसरी तरफ अतीत और वर्तमान के संघर्ष की अनुगूंज भी दिखलाई पड़ती है। मानव मूल्यों की संकल्पना को तराशने का सकारात्मक सृजन लघुकथा है।
सम्मेलन के प्रथम सत्र में राजस्थान की चर्चित लेखिका अंजू अग्रवाल ने अपनी एक दर्जन लघुकथाओं का पाठ किया। इन लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी देते हुए सिद्धेश्वर ने कहा कि अंजू अग्रवाल की एकल लघुकथा पाठ में उनकी कई सशक्त लघुकथाओं को सुनकर अभिभूत हूँ। अंजू अग्रवाल की लघुकथा ‘चोर’ में उस विराट मानवीय सद्भावना की तस्वीर उजागर होती है, जो अभाव से ग्रस्त एक गरीब के हृदय में मलिन विचार को भी अनुशासित व्यवहार में बदल देती है।
विजय कुमारी मौर्य विजय ने गरीबी, मधुरेश नारायण ने आग्रह, रूबी भूषण ने धरोहर एवं अपूर्व कुमार ने हिंदी दिवस आदि लघुकथा का पाठ किया, जिन पर देशभर के दर्शकों द्वारा ढेर सारी प्रशंसा मिली। अशोक कुमार, कीर्ति काले, चाहत शर्मा, अंजना पचौरी, पुष्पा शर्मा, नीरज सिंह आदि की भी उपस्थिति रही l