कुल पृष्ठ दर्शन : 881

You are currently viewing विश्वास से दर्शन करने वाले कभी बेरंग नहीं लौटते

विश्वास से दर्शन करने वाले कभी बेरंग नहीं लौटते

सपना सी.पी. साहू ‘स्वप्निल’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
********************************************

मध्यप्रदेश में स्थित देवास धार्मिक दृष्टि से अति विशेष स्थान रखता है। यहाँ जगप्रसिद्ध माँ तुलजा भवानी और माँ चामुण्डा के मंदिर के साथ ही भगवान दत्तात्रेय का मंदिर भी अतिप्रसिद्ध है। त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश के अंशावतार भगवान दत्तात्रेय का यह श्रद्धाधाम देवास से १० किलोमीटर दूर ग्राम बांगर में स्थापित है। इस चैतन्य मंदिर में आस्थावान उपासक हर गुरुवार को सैकड़ों की संख्या में दर्शन पाने को लालायित रहते हैं।
यहाँ पूजन-अर्चन के लिए श्री दत्तात्रेय भगवान के अनन्य भक्तबाल ब्रह्मचारी केशव गुरुनाथ कुलकर्णी रहे। वे कर्नाटक के बेलगांव के पास कालकुंद्री नामक छोटे गाँव से आए थे। भक्तगण इन्हें आदर व स्नेह से ‘काका महाराज’ कहते थे। जैसा विदित है कि, कर्नाटक के गुलबर्गा में प्रभु श्री दत्तात्रेय का प्रमुख स्थान है। यहीं से काका महाराज को स्वप्न में आज्ञा मिली कि श्री दत्तात्रेय भगवान की चरण पादुका मालवा के उस स्थान पर लेकर जाइए, जहाँ शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग के बीच सती का स्थान होने के संग श्मशान भूमि और जल का बहाव हो। आदेशानुसार काका महाराज ऐसे क्षेत्र की खोज करते हुए देवास के ग्राम बांगर में आ गए। बांगर नामक जगह यहाँ के निवासी श्री दुर्गा शंकर पंड्या जी की कृषिभूमि के रूप में मिली। यहाँ पितामह ने पहले से ही दिवगंत पिता जी की स्मृति में शिवलिंग की स्थापना की हुई थी। जब काका महाराज ने पितामह को बताया तो उन्होंने भगवान इच्छा का सम्मान करते हुए आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा १० जुलाई, १९७५ गुरुवार को श्री दत्तपादुका को प्राणप्रतिष्ठित करवाया। ४८ वर्ष पूर्व स्थापित यह पूजनीय पादुका सिद्ध व जागृत तो है ही,
अन्य विशेषता है कि श्री दत्तात्रेय भगवान का यह एकमात्र ऐसा पूजा स्थल है, जहाँ से खड़े रहकर गर्भ ग्रह विराजित चरण पादुका, श्री दत्त भगवान की सिद्ध मूर्ति तथा मंदिर कलश पर लहराती ध्वजा को एकसाथ निहार सकते हैं। मान्यता है कि, उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर से गुजरने वाली कर्क रेखा इन तीनों मंदिरों को एक सरल सीधी रेखा में मिलाती है। यहाँ मनोकामना लेकर श्रद्धालु न केवल देवास, इंदौर के आसपास से ही नहीं, वरन मध्यप्रदेश संग महाराष्ट्र, राजस्थान, दक्षिण भारत के साथ सम्पूर्ण भारत के विभिन्न स्थानों से वर्ष पर्यन्त आते हैं।
१२ जनवरी १९७८ को काका महाराज के समाधिस्थ होने के पश्चात् उनके स्थान पर उनके अनुज श्री गजानन कुलकर्णी जी ने मंदिर में पूजा, अर्चना व सेवाएं देते अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ४ नवम्बर २०२१ को गजानन गुरुनाथ कुलकर्णी (छोटे काका महाराज) का भी स्वर्गवास हो गया। वर्तमान में मंदिर में पूजन व सेवाकार्य उनके सुपुत्र दत्त प्रसाद कुलकर्णी कर रहे हैं।
लोक मान्यता के अनुसार यहाँ पूर्ण आस्था विश्वास के साथ ५ गुरुवार के व्रत रखकर दर्शन-लाभ लेने और श्रीफल को बांधकर रखने से मनोकामना पूर्ण होती है। यहाँ प्रतिवर्ष श्री दत्तात्रेय जन्मोत्सव पर भंडारे का आयोजन होता है। इस भंडारे में पहले मुश्किल से १००-१५० जन प्रसादी पाते थे, पर काका महाराज ने वर्षों पूर्व देवास के प्रतिष्ठित पवार परिवार के सदस्य नामी छायाकार रहे प्रेम गणपत राव पवार को कहा था कि, आने वाले समय में यहाँ प्रसाद पाने के लिए श्रद्धालुओं की कतार मंदिर प्रांगण से लेकर राजमार्ग तक लगेगी। उनकी भविष्यवाणी सत्य हुई, अब यहाँ हजारों-लाखों भक्त भंडारे का प्रसाद पाने को पधारते हैं। ४८ वर्ष से होने वाले श्रीदत्त जयंती के भंडारे में विशेष रूप से आसपास के १०-११ गाँव के कार्यकर्ता निश्चित कार्यव्यवस्था में लगकर सफलतापूर्वक सेवाएं देते हैं। यह उनकी आस्था का ही फल है कि, इतना वृहद प्रसादी आयोजन निर्विघ्न होता है। यहाँ प्रथम भंडारा इसी ग्राम के निवासी स्व. परसराम मिस्त्री ने करवाया था।

भगवान शंकर स्वरूप श्री दत्तात्रेय भगवान के मंदिर में वर्षभर के प्रमुख कार्यक्रमों में श्री दत्त जयंती, गुरुपूर्णिमा, पादुका स्थापना दिवस, गाणगापुर यात्रा (क्षेत्रगांव भ्रमण यात्रा), शारदीय नवरात्रि, काका महाराज पुण्यतिथि आदि विशेष है। इस मनोकामना पूर्ण करने वाले सिद्ध मंदिर में दर्शन लाभ लेना सौभाग्य को बढ़ाने वाला है। यहाँ सच्चे आस-