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समस्या को समझें,सुलझाने का सार्थक प्रयास करें राजनेता

राधा गोयल
नई दिल्ली
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देश के निर्माण के लिए राजनेताओं का सकारात्मक योगदान होना चाहिए। आजकल हम देखते हैं कि ज्यादातर राजनेता स्वार्थी हैं। केवल अपना उल्लू सीधा करते हैं। जब चुनाव होते हैं तो घर-घर जाकर लोगों से गले मिलते हैं। बड़े-बड़े वादे करते हैं,घड़ियाली आँसू बहाते हैं,पर चुनाव जीत जाने के बाद फिर उनके दर्शन ही नहीं होते।
राज्यसभा और लोकसभा के सदन में भी किस प्रकार हंगामा होता है,देखकर शर्म आती है। शुक्र है कि आजकल के बच्चे इन चीजों को नहीं देखते। उनका तो वैसे ही आजकल चारित्रिक पतन बहुत अधिक हो रहा है,इसे देखकर तो न जाने क्या हाल हो ? जब हम जैसे लोगों का माथा ही बुरी तरह भन्ना जाता है कि,जिन्हें हमने समाज की सेवा करने के लिए चुनकर भेजा है,अपना अमूल्य मत दिया है, वे समाज की सेवा नहीं कर रहे हैं,मेवा खा रहे हैं। केवल लड़ाई कर रहे हैं। सदन बार- बार स्थगित होता है,फिर शुरू होता है और कई बार तो सत्र बिना कोई विधेयक पारित किए समाप्त भी हो जाता है।
सांसदों-विधायकों को कितना-कितना पैसा मिलता है। कितनी ही सुविधाएं मिलती हैं,लेकिन देश के नाम पर कुछ नहीं करते।
राजनेता चाहें तो अपने पार्टी फंड से बहुत कुछ कर सकते हैं। समाज सुधार के बहुत से काम कर सकते हैं। अनेक ऐसे काम हैं,जिनमें वास्तव में सुधार की अपेक्षा है। गाँव की बात तो छोड़ो,शहरों में भी कई जगह स्थिति बेहद बदहाल है। जरूरत इस बात की है कि राजनेता सदन में एक-दूसरे की बात सुनें। सबको अपना मत प्रकट करने का अधिकार है,किंतु हंगामा करने का नहीं। वाद-विवाद होना,सहमत-असहमत होना,तर्क-वितर्क करना बहुत अच्छी बात है। विपक्ष इसीलिए होता है कि,सत्तासीन दल यदि कोई गलत काम कर रहा है तो उसको सही राह दिखाए;लेकिन अभद्र भाषा में नहीं,मर्यादा में रहकर। मर्यादित भाषा में कुछ सार्थक प्रयास करें,न कि पूरा का पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ा दें।
आज पाक की नापाक हरकतों और चीन की करतूतों से पूरा देश आक्रोशित है। हमारी सेना ने पाकिस्तानी सेना को मुँहतोड़ जवाब देना शुरु कर दिया है,जिससे देश के लोगों में अति उत्साह है। कविगण भी अपनी कलम को धार दे रहे हैं और जोशीली कविताएँ लिख रहे हैं। ऐसे में राजनेताओं का दायित्व है कि राष्ट्रप्रेम से संबंधित रचनाओं को सम्मान दें। कोई भी व्यक्ति जो राष्ट्रहित से संबंधित किसी भी तरह का सहयोग दे रहा है,उसे प्रोत्साहित करें। कभी लाल बहादुर शास्त्री ने एक नारा दिया था ‘जय जवान जय किसान’। दोबारा वही रास्ता अपनाना होगा,क्योंकि आज देश को इस नारे की बहुत अधिक जरूरत है। किसान आत्महत्या कर रहा है। अन्नदाता ही भूखा मरेगा तो देश को अन्न कहाँ से मिलेगा। सरकार और राजनेताओं को इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है।
कहीं पर भारी बाढ़ आती है तो कहीं सूखे से फसलें बर्बाद होती हैं। नालों की सफाई भी बारिश के मौसम में ही होती है। इसके लिए पहले से ही इंतजाम होने चाहिए। जहाँ सूखा पड़ता है,वहाँ नहरों का जाल बिछाया जाए। रेतीली जगहों में बड़ी-बड़ी पाइप लाइन डाली जाएँ,जिससे कि पानी की समस्या का समाधान हो सके। हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते,इस बारे में राजनेताओं को सोचने की बहुत अधिक जरूरत है। बाढ़ आने पर ही लोगों को हेलीकॉप्टर से रोटियाँ या भोजन सामग्री फेंकने के बजाय पहले से ही बाढ़ से निपटने के उपाय कर लें और गर्मी के मौसम में सूखे से बचने के उपाय कर लें। आज नदियाँ सूख रही हैं,नदियों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है।
सड़क पर गड्ढे होते हैं,उसी पर बजरी डलवा देते हैं। नतीजा…सड़क ऊँची होती जाती है और मकान नीचे होते जाते हैं और उनमें बरसात का पानी भर जाता है। फिर राहत कार्यों के नाम पर राशि बाँटी जाती है,जो पता नहीं किसी को मिलती भी है या नहीं!
हमारे यहाँ बाहर के देशों से तो नई-नई तकनीक सीखने की कोशिश करते हैं और उस पर पैसा खर्च करते हैं,लेकिन अपने ही देश का कोई व्यक्ति यदि कोई नई तकनीक सुझाए तो उसको नजरअंदाज कर दिया जाता है,जबकि ऐसे लोगों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
ऐसे ही सैनिकों की चिंता राजनेताओं के साथ-साथ हम समाज के लोगों की भी जिम्मेदारी है और समाज के लोग इसमें पीछे भी नहीं रहेंगे,लेकिन पहल राजनेताओं को ही करनी पड़ेगी। यदि वे अपने लिए मुफ्त बंगला ले सकते हैं तो सैनिकों के परिवारों के लिए घर क्यों नहीं ? आखिर सैनिकों को मुफ्त यात्रा भत्ता क्यों नहीं ? सैनिकों के परिवारों को पेंशन क्यों नहीं ? सच्चाई में सैनिकों के प्रति सम्मान क्यों नहीं ? सैनिकों के घर जाकर उनके दु:ख दर्द में शामिल होकर केवल तस्वीर खिंचवाने से काम नहीं चलेगा। बाद में भी उनकी पीड़ाओं का हाल जानकर उनकी जरूरतों को पूरा करना और उनका पूरी तरह से ध्यान रखा जाने पर
भी सारे राजनेताओं को एकमत होना पड़ेगा।
राजनेताओं को चाहिए कि अपने इलाके में घूम-घूमकर चाहे स्वयं देखें,चाहे किसी और को भेजें। समाज की समस्याओं के बारे में जानने की कोशिश करें। उस काम को करवाएँ। जब लोगों को काम होता हुआ नजर आएगा तो लोग भी उसमें बढ़-चढ़कर सहयोग करेंगे,लेकिन यह काम बाहर निकलने से होगा। आलीशान ए.सी. कमरों में कुर्सी तोड़ने से भी नहीं होगा।
कितनी ही प्रतिभाएँ हमारे देश में उपेक्षित होकर बाहर पलायन कर रही हैं। प्रतिभा पलायन को रोकना होगा। प्रतिभा को प्रोत्साहित करें, विद्यार्थियों को शोध कार्य में भरपूर सहयोग दें।
हर हाथ को रोजगार दें।
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर केवल एक दिन के लिए पर्यावरण संरक्षण दिवस न मनाएं,अपितु पर्यावरण को बचाने के लिए पुख्ता इंतजाम करें। प्रकृति से जितना लिया है,उतना उसे देने की कोशिश भी करें।
विभागों में कितने ही पद स्वीकृत हैं,लेकिन रिक्त पड़े हुए हैं। यह हाल तो तब है जबकि अनगिनत पढ़े-लिखे लोग बेरोजगार घूम रहे हैं।
आज भी अनेक जगह अतिक्रमण के नाम पर लोगों ने झुग्गियाँ बनाई हुई हैं जबकि,कभी चुनावी दौर में ही बरसों पहले सरकार ने उन्हें २५-२५ गज जमीन आवंटित की थी। यदि वास्तव में ही राजनेता देश को समृद्ध और संपन्न देखना चाहते हैं तो जरूरत इस बात की है कि जमीन देने के बदले उनके लिए हजार गज में १० मंज़िल ऊँची इमारत बनाई जाए। वे मकान मुफ्त में न देकर बहुत कम किराए पर दिए जाएँ,जिससे कि उनका उस पर मालिकाना हक न हो। नेता लोग वास्तव में ही देश को उन्नति के शिखर पर देखना चाहते हैं तो चुनावी दिनों में आकर इन लोगों से झूठे वादे न करें।
पानी की समस्या पर भी नजर डालनी आवश्यक है। पानी की कितनी तंगी है। स्तर दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है। एक दिन ऐसा आएगा कि रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पानी नहीं होगा। सारे राजनेता एकमत होकर यह बात सोचें कि वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बहुत जरूरी है। घरों के पानी का भी सरकार ही इस तरह से इंतजाम करे कि बारिश का पानी सीधा नीचे हार्वेस्टिंग सिस्टम में जाए। जिन लोगों की बड़ी कोठियाँ हैं,उन पर सरकार अपने खर्च से यदि सौर ऊर्जार संयंत्र लगवा दे तो बिजली की कितनी बचत होगी।
यदि हर राजनेता अपने-अपने इलाके की समस्या को समझे,सुलझाने का सार्थक प्रयास करे और अपना व्यक्तिगत(सांसद निधि से) योगदान भी दे तो निश्चित ही देश की दशा बदलेगी। इससे नवयुवकों को सही दिशा में चलने की प्रेरणा मिलेगी और समाज भी ऐसे राजनेता का बढ़-चढ़कर साथ देगा।

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