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साहित्यिक परिवेश के लिए कभी-कभी साहित्य अध्ययन खतरनाक- सिद्धेश्वर

पटना (बिहार)।

साहित्य सृजन रोज-रोज और साहित्य अध्ययन कभी-कभी ?दरअसल, यह जवाब ना होकर एक सवाल है, आज के उन तमाम नए पुराने लेखकों के सामने, जो नित नई-नई फरमाइश पर तुरंत रचना लिख डालते हैं। अब लेखक बेचारा क्या करे ? छपास का रोग उसे परेशान कर डालता है। थोड़ा बहुत गूगल का सहारा लेकर झटपट ही रचना तैयार कर देनी है।ऐसी स्थिति में रोज-रोज साहित्य अध्ययन करने का समय ही कहाँ है और इसकी जरूरत ही क्या है ?
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में कवि-कथाकार सिद्धेश्वर ने ‘आभासी’ कार्यक्रम ‘तेरे मेरे दिल की बात’ में उपरोक्त बात कही। साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संदर्भों से जुड़े इस कार्यक्रम में ‘साहित्य सृजन रोज-रोज:साहित्य अध्ययन कभी-कभी ???’ पर आपने कहा कि प्रेमचंद और निराला युग में कम्प्यूटर, मोबाइल और ढेर सारे कवि सम्मेलन का मंच था क्या ? सोशल मीडिया तक आसानी से रचनाओं की पहुंच थी क्या ? ईमानदारी से साहित्य सृजन करने वालों की ऐसी उपेक्षा होती थी क्या ?, लेकिन आज के समय में यह सब संभव है, तब लेखक साहित्य का अध्ययन कम और साहित्य का सृजन अधिक कर रहा है। इसमें आश्चर्य कैसा, क्योंकि ऐसा विचार रखने वाले साहित्यकार भविष्य नहीं, सिर्फ वर्तमान देखते हैं।
इस विचार पर परिषद की सचिव ऋचा वर्मा ने कहा कि, सोशल मीडिया की उपस्थिति ने लोगों को एक स्वतंत्र मंच उपलब्ध करा दिया है जिसमें उनकी अपनी मित्रों की टोली होती है। करना सिर्फ इतना होता है कि जो भी दिल में आए उसे लिख दें और साहित्य के नाम पर लोगों के सम्मुख परोस दें। उस पर तुर्रा यह कि, लोग उनकी रचनाएं नहीं पढ़ते हैं।
राज प्रिया रानी ने कहा कि, साहित्यिक यात्रा के दौरान अगर लेखक अध्ययन और सृजन दोनों पहलुओं को समता के साथ रोजमर्रा में शामिल करें तो साहित्यिक सफर सहज, प्रभावपूर्ण और उत्कृष्ट होगा।
रजनी श्रीवास्तव अनंता ने कहा कि, साहित्य अध्ययन रोज-रोज और साहित्य सृजन कभी-कभी होना चाहिए। तभी साहित्य में गुणवत्ता आएगी, तभी पाठक मिल सकेंगे। इस अवसर पर गार्गी राय ने कहा कि, लेखन की विधिवत शिक्षा के लिए जरूरी है कि, हम समाज के अनुभवों का भी बारीकी से अध्ययन करें।
डॉ. शरद नारायण खरे (मप्र) के विचार से-बिना अध्ययन के सृजन कार्य गुणवत्ता से विमुख हो जाता है। अध्ययन कवि-लेखक के चिंतन व प्रस्तुति को नवीन आयाम, शिल्प, विषयवस्तु, समसामयिकता बोध सभी कुछ प्रदान करता है। ताज़गी व विविधता लाने के लिए सतत् अध्ययन अत्यंत आवश्यक होता है।

इंदु उपाध्याय, विजय कुमारी मौर्य, एकलव्य केसरी, अपूर्व कुमार व प्रियंका श्रीवास्तव आदि भी अपने विचार प्रस्तुत किए।

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