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सूर्य तुम्हें ही बनना है

डॉ.नीलिमा मिश्रा ‘नीलम’ 
इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

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नश्वर जग है आत्मदीप बन
तुम्हें निरंतर जलना है,
तम की घोर निशा के आगे
सूर्य तुम्हें ही बनना है।

करो साधना इष्टदेव की,
पुण्य करो संचित केवल।
स्वार्थ लोभ का त्याग करो तुम,
ज्ञान भक्ति का ले संबल।
भटक रहे हो जन्म-मरण के,
चक्र का भेदन करना है।
उस पथ की तुम ओर बढ़ो,
साधक अमृत रस चखना है।
नश्वर जग है…

तुममें है ऋषियों-सा चिंतन,
आत्म तेज़ गौतम जैसा।
हाथ में तेरे वेद ग्रंथ हैं,
ज्ञान योग योगेश्वर-सा।
नित्य साधना रत जीवन हो,
तुम्हें भगीरथ बनना है।
पावन गंगा की जल धारा,
जैसे कल कल बहना है।
नश्वर जग है…

रवि आलोकित करता जग को,
लेकिन कुछ भी चाह नहीं।
धरती माँ सह लेती सब-कुछ,
अपनी कुछ परवाह नहीं।
गगन पवन जल वृक्ष सरीखा,
आत्म समर्पित बनना है।
सत् चित् आनन्दित हो जीवन,
यही साधना करना है।

नश्वर जग है आत्मदीप बन,
तुम्हें निरन्तर जलना है।
तम की घोर निशा के आगे,
सूर्य तुम्हें ही बनना है।
नश्वर जग है…॥

परिचय-डॉ.नीलिमा मिश्रा का साहित्यिक नाम नीलम है। जन्म तारीख १७ अगस्त १९६२ एवं जन्म स्थान-इलाहाबाद है। वर्तमान में इलाहाबाद स्थित साउथ मलाका (उत्तर प्रदेश) बसी हुई हैं। स्थाई पता भी यही है। आप एम.ए. और पी-एच.डी. शिक्षित होकर केन्द्रीय विद्यालय (इलाहाबाद) में नौकरी में हैं। सामाजिक गतिविधि के निमित्त साहित्य मंचन की उपाध्यक्ष रहीं हैं। साथ ही अन्य संस्थाओं में सचिव और सदस्य भी हैं। इनकी लेखन विधा-सूफ़ियाना कलाम सहित ग़ज़ल,गीत कविता,लेख एवं हाइकु इत्यादि है। एपिग्रेफिकल सोसायटी आफ इंडिया सहित कई पत्र-पत्रिका में विशेष साक्षात्कार तथा इनकी रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। ब्लॉग पर भी लिखने वाली डॉ. मिश्रा की विशेष उपलब्धि-विश्व संस्कृत सम्मेलन (२०१५,बैंकाक-थाईलैंड)और कुम्भ मेले (प्रयाग) में आयोजित विश्व सम्मेलन में सहभागिता है। लेखनी का उद्देश्य-आत्म संतुष्टि और समाज में बदलाव लाना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-डॉ. कलीम कैसर हैं। इनकी विशेषज्ञता-ग़ज़ल लेखन में है,तो रुचि-गायन में रखती हैं।