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स्वच्छता अभियान की धज्जियाँ मत उड़ाइए

डॉ.शशि सिंघल
दिल्ली(भारत)

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आजकल किसी पेड़ की हालत तो देखिए,जो आप और हमारे द्वारा डाली गई गंदगी को अपने आँचल में समेटे अपनी बेबसी पर आँसू बहाने को मजबूर है। आखिर वह अपना दु:खड़ा कहे तो किससे कहे ? ऐसी दुर्दशा सिर्फ एकाध ही पेड़ की नहीं,बल्कि आप जिस क्षेत्र में भी जाएंगे,वहीं जगह-जगह सड़कों पर कूड़े के ढेर,बगीचों में जहाँ-तहाँ कूड़ा-करकट तथा धर्म व आस्था के नाम पर लोगों द्वारा अपने घरों से निकाली गयीं फटी-टूटी भगवान की तस्वीरें-मूर्तियों के साथ-साथ प्रयोग हुई पूजा सामग्री पेड़ों ‌के नीचे पड़ी मिल जाएंगी।
महात्मा गाँधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था। उन्होंने स्वच्छ भारत का सपना देखा था। वे चाहते थे कि देश का हर नागरिक एकसाथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाए रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करे,लेकिन‌ गाँधी जी का सपना,सपना ही बनकर रह गया। इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया या ये कहें कि‌ किसी को भी देश को स्वच्छ रखना जरूरी नहीं लगा। २०१४ में जब नरेन्द्र मोदी सरकार बनी तब मोदी जी ने महात्मा गाँधी के स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करने का बीड़ा उठाया और स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया।उन्होंने देश के नागरिकों को इस अभियान से जुड़कर इसके सफल कार्यान्वयन के लिए भी प्रेरित किया।
भले ही दिल्ली को प्रदूषण रहित व हर तरह से साफ-सुथरा बनाने की कवायद युद्ध स्तर पर चल रही है,और ऎसे में दिल्लीवासियों को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सीख भी दी जा रही है तथा उनसे सुधरने की अपील की जा रही है,लेकिन लगता है दिल्लीवासियों के कानों तक कोई आवाज नहीं पहुंच रही है या फिर वे हम नहीं सुधरेंगे की तर्ज पर चल रहे हैं। तभी तो वे खुलेआम सड़क पर गंदगी फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं।
बड़े दु:ख की बात है कि लोग धार्मिक कैलेण्डर,फूलमालाएं,दीए, हवन सामग्री व टूटी तस्वीरें आदि पेड़ों के नीचे खुले में फेंककर अपनी धार्मिक आस्था की इतिश्री कर लेते हैं। अब वही सामग्री किसी के पैरों तले रौंदी जाए,या आवारा जानवरों द्वारा उसमें मुँह मारकर उसे इधर-उधर फैलाया जाए या फिर किसी वाहन के नीचे आए,इससे उनका कोई सरोकार नहीं। कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा कि वे जिस शिद्दत के साथ पूजा सामग्री को घर से बाहर निकाल आए हैं,उसकी क्या दुर्दशा हो रही है ?
माना कि हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि पूजा सामग्री तथा देवी- देवताओं के चित्र,प्रतिमाएं आदि इधर-उधर न फेंकी जाएं,इससे उन देवी-देवताओं का अपमान होता है,मगर आज हम स्वयं अपनी करतूतों से देवी-देवताओं का अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं। पूजा में प्रयुक्त सामग्री व अन्य सामान को कभी नदी, तालाबों व गंगा में बहाकर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं,तो कभी पेड़ के नीचे डालकर वातावरण को गंदा कर रहे हैं। समझ में नहीं आता कि धर्म के नाम पर गंदगी फैलाना कौन से ग्रंथ में लिखा है ? ये कैसी आस्था और भक्ति है कि पूजा-पाठ के बाद प्रयुक्त की गई पूजा सामग्री को घर से निकाल कर बाहर खुलेआम फेंक दो ? लोगों में कब जागरूकता आएगी ? लोग कब समझेंगे कि उनकी हरकतों का खामियाजा उनके साथ-साथ दूसरों को भी उठाना पड़ता है,जबकि सही मायने में हमें चाहिए कि हम ऐसी सामग्री को किसी पार्क में या अपने घर के पिछवाडे़ में गड्डा खोदकर उसमें दबा दें। इससे ना तो हमारी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचेगी,ना ही नदियां,तालाब व गंगा आदि का पानी प्रभावित होगा और ना ही ये सामग्री किसी के पैरों तले रौंदी जाएगी।
देश के हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने घर को ही नहीं,बल्कि अपने आसपास के क्षेत्र को भी स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी ले। कूड़ा-करकट व अन्य बेकार सामग्री को इधर- उधर ना फेंकने का संकल्प लें। तभी हम अपने शहर को प्रदूषण रहित,स्वच्छ एवं हरा-भरा बना पाएंगे। अन्यथा “एक चना कभी भाड़ नहीं झोंक सकता।”

परिचय-डॉ.शशि सिंघल का जन्म २१ सितम्बर १९६६ को आगरा में हुआ है। वर्तमान में आप स्थाई रुप से नई दिल्ली में रहती हैं। देश कॆ हृदय प्रदेश दिल्ली की वासी और हिंदी भाषा का ज्ञान रखने वाली डॉ.सिंघल की पूर्ण शिक्षा पीएचडी है। आपका कार्यक्षेत्र-घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढा़ना है। इससे पहले ४ साल तक कोचिंग सेन्टर चलाया है। कुछ वर्ष अखबार में उप-सम्पादक पद का कार्यभार संभाला है। सामाजिक गतिविधि में क्षेत्रीय कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। लेखन विधा-लेख (सामाजिक,समसामयिक,सांस्‍कृतिक एवं ज्वलंत विषयों पर)एवं काव्य भी है। काव्य संग्रह में कुछ कविताओं का प्रकाशन हुआ है तो काव्य संग्रह-‘अनुभूतियाँ प्रेम की’ आपके नाम है। करीब २८ वर्षों से विभिन्न राष्ट्रीय पत्र – पत्रिकाओं में आपकी ५०० से ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। ब्लॉग पर लिखने में सक्रिय डॉ.सिंघल की विशेष उपलब्धि-आगरा की पहली महिला होने का सम्मान है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-लोगों को जागरूक करने का भरपूर प्रयास करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक- मुंशी प्रेमचंद हैं,तो प्रेरणापुंज-डॉ.शशि तिवारी हैं। विशेषज्ञता-संस्कृत भाषा का ज्ञान है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिन्दी मेरी मातृभाषा है। हिन्दी के प्रति मेरा विशे़ष लगाव है। सबको मिलकर हिन्दी भाषा की लोकप्रियता के लिए और काम करना चाहिए।”