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हँसा मत कर

राजबाला शर्मा ‘दीप’
अजमेर(राजस्थान)
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जिसके हँसने से मुस्कुराती,
मेरे घर की दरो-दीवारें
कैसे कह दूं मैं उससे,
इस कदर हँसा मत कर।

उसकी उन्मुक्त हँसी-
जैसे मंदिर में घंटियां बजतीं,
सूने अंतस में हिलोरें उठतीं
हरसिंगार के फूलों सी पुनीत हँसी,
बाल-किलकारी सी लगती भली
खिलखिलाता मेरे जीवन का हर प्रहर।
कैसे कह दूं मैं उससे,
इस कदर हँसा मत कर।

जिसके हँसने से हम बुजुर्गों के,
चेहरे पर हँसी आती है
हास-परिहास से उसके,
आँखों में चमक आती है
इतना हँसती है, बरबस
हमको भी हँसी आती है
जीने का अंदाज सिखाती जो शामो-सहर।
कैसे कह दूं मैं उससे,
इस कदर हँसा मत कर।

मुझसे कहती है मेरे हँसने पर,
घर-बाहर सभी टोकते हैं
क्या करूं? हँसी मेरी नहीं रुकती,
मुझे हँसने से सब रोकते हैं
मैं बोली,-“नारी होकर इतना हँसती है,
बड़ी सशक्त है, समाज से ना डरती है।”
जिंदगी भर हम हँसने को तरसते ही रहे,
संस्कार के नाम पे, मन ही मन घुटते रहे।
समाज चाहता है, नारी ना हँसे-बोले,
मौन के ताले रखे, अपनी जुबां न खोले।
तुम हँसती हो और हँसाती हो,
सारे ग़म भूल मुस्कुराती हो।
यूँ ही प्यारी-सी मासूम हँसी हँसती रहो,
रोकने, टोकने का भरम न दिल में धरो।
जिसकी स्मित से आँगन में रोशनी गई भर।
कैसे कह दूं मैं उससे,
इस कदर हँसा मत कर॥

परिचय– राजबाला शर्मा का साहित्यिक उपनाम-दीप है। १४ सितम्बर १९५२ को भरतपुर (राज.)में जन्मीं राजबाला शर्मा का वर्तमान बसेरा अजमेर (राजस्थान)में है। स्थाई रुप से अजमेर निवासी दीप को भाषा ज्ञान-हिंदी एवं बृज का है। कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी, गज़ल है। माँ और इंतजार-साझा पुस्तक आपके खाते में है। लेखनी का उद्देश्य-जन जागरण तथा आत्मसंतुष्टि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-शरदचंद्र, प्रेमचंद्र और नागार्जुन हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज-विवेकानंद जी हैं। सबके लिए संदेश-‘सत्यमेव जयते’ का है।

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