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हम पेड़ नहीं बन सकते

राधा गोयल
नई दिल्ली
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क्यों कहते हो बार-बार ‘हम पेड़ नहीं बन सकते हैं ?’
इच्छाशक्ति हो तो हम हर तूफां से लड़ सकते हैं।

भीषण गर्मी सह, जो ठंडी छाँव पथिक को देता है,
और हिमपात के होने पर भी, अविचल अविकल रहता है।

कोई उसको पत्थर मारे, वो उसको फल देता है,
भूखे निर्बल शोषित जन की उदरपूर्ति करता है।

जितना ज्यादा बढ़ता है, उतना ज्यादा झुक जाता है,
ऑक्सीजन उत्सर्जन कर जीवनदायी बन जाता है।

पंछी पेड़ों की कोटर में निर्भय होकर रहते हैं,
पादप भी वात्सल्य से भरकर प्यार लुटाते रहते हैं।

वृक्षों ने लकड़ी दी अपनी, सबने अपने भवन बनाए,
आकर्षक फर्नीचर से मानव ने अपने महल सजाए।

पर वृक्षों ने बुरा न माना, उसने हरदम देना चाहा,
बुरा लगा जब मानव ने बेबस पंछी का हित न चाहा।

अपने स्वार्थ की खातिर जब बेबस जीवों का नीड़ गिराया,
क्यों मानव को और किसी का सुख से रहना तनिक न भाया ?

हाय! आज मानव ने इन पेड़ों का कैसा हाल किया ?
पेड़ काट डाले, लोगों के जीवन को बेहाल किया।

पंछी कहाँ बनाए बसेरा, पथिक को शीतल छाँव नहीं,
अरे अमानव ! क्यों तेरी मानवता आज खो गई कहीं।

तुमने केवल लेना सीखा, देना नहीं जानते हो,
पेड़ नहीं बन सकते, लेकिन इतना तो कर सकते हो।

पेड़ काटना बंद करो और पेड़ लगाना शुरू करो,
मानव हो, मानव होने का मानवीय-सा कर्म करो॥

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