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हिन्दी का विरोध शुद्ध राजनीतिक

प्रेम चन्द अग्रवाल
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पी.टी. उषा ने अपनी राज्य सभा सदस्यता की शपथ संघ की राजभाषा हिन्दी में ली है। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि, पी.टी. उषा दक्षिण भारत के राज्य केरल से आती है। कुछ नेताओं की नेतागिरी हिन्दी विरोध से चलती है या हिन्दी विरोध के चलते वे लोगों के बीच में चर्चा का विषय बने रहते हैं। दक्षिण भारत हो या अन्य कोई क्षेत्र, यह हिन्दी विरोध केवल हवा में ही है। यह आम धारणा है कि दक्षिण भारत, विशेषत: तमिलनाडु में लोग हिन्दी के कट्टर विरोधी हैं। एक प्रयोग करके देख लें। शिक्षा में ३ भाषाओं के सूत्र को स्थानीय भाषा, अंग्रेजी और हिंदी न करके आप ऐसा कर लें: स्थानीय भाषा, अंग्रेजी और तीसरी कोई भी भारतीय भाषा, लेकिन तीसरी भाषा चुनने का अधिकार केवल और केवल बच्चों का स्वयं का होगा (इसमें बच्चों के माता पिता भी सम्मिलित हैं)। मैं शर्त लगा सकता हूँ कि १०० नहीं तो ९५ फीसद बच्चे तीसरी भाषा का विकल्प हिन्दी ही चुनेंगे। हिन्दी का विरोध शुद्ध राजनीतिक है।
हिन्दी विरोधियों को एक बात समझने की आवश्यकता है कि, हिन्दी किसी भी भारतीय भाषा के न तो विरोध में है और न ही हिंदी के कारण से किसी भी भारतीय भाषा के बोलने-समझने वालों में कमी आने वाली है। अपितु हिन्दी भाषा अंग्रेजी के लिए चुनौती है, अंग्रेजी की वरियता इससे प्रभावित होती है।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)

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