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हुंकार

ओमप्रकाश अत्रि
सीतापुर(उत्तरप्रदेश)
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अपने श्रम को
बेचने वाले श्रमिकों,
एक हो जाओ
जैसे-
एक हो जाती हैं
आग की लपटें,
अब नहीं है
तुम्हारे पास,
खोने के लिए कुछ भी।
तुम्हारा जीवन,
जकड़ा है
आर्थिक विकास के चरित्र से,
तार-तार होकर
जीवन चला रहे हो,
फिर भी
मरते हैं क्यों
तुम्हारे बच्चे भूख से ?
ढीली हो गयी है
तुम्हारे शरीर की खाल
काम की मार से,
सूख गया है
तुम्हारी नसों का खून,
पीला पड़ गया है
तुम्हारा जिस्म
और बैठ गयी हैं
तुम्हारी आँखें।
ऊपर से,
खड़ी है निगलने को
तुम्हें मंहगाई,
मानो
महाकाल की तरह
रसना पसारे,
सुख छिन्न
हो गया है तुम्हारा,
होते विकास
बदलते समाज में।
कुछ भी,
बिगड़ता नहीं है
उनका
जो दुहते रहते हैं,
तुम्हारी मेहनत को,
तुम्हारी चीख
कराह की आवाज़,
उनके कानों में
संगीत बन गयी है।
हो रही है,
तुम्हारी हत्या
दब गया है
तुम्हारा खून
उनके धन के दबाव से,
बढ़ती जा रही है
उनकी अमीरी,
तुम्हारी ही मेहनत से।
आर्थिक लक्ष्य
पूर्ण करने में,
लगे हैं वो लोग
तुम्हारे ही श्रम से,
सम्भलो!
सम्भालो अपने कुटुम्ब को,
तोड़ दो
शोषक और शोषित के
अन्तर्द्वन्द को,
मिटा दो उनको
जो खेलते हैं तुम्हारे जीवन सेll

परिचय-ओमप्रकाश का साहित्यिक उपनाम-अत्रि है। १ मई १९९३ को गुलालपुरवा में जन्मे हैं। वर्तमान में पश्चिम बंगाल स्थित विश्व भारती शान्ति निकेतन में रहते हैं,जबकि स्थाई पता-गुलालपुरवा,जिला सीतापुर है। आपको हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी सहित अवधी,ब्रज,खड़ी बोली,भोजपुरी भाषा का ज्ञान है। उत्तर प्रदेश से नाता रखने वाले ओमप्रकाश जी की पूर्ण शिक्षा-बी.ए.(हिन्दी प्रतिष्ठा) और एम.ए.(हिन्दी)है। इनका कार्यक्षेत्र-शोध छात्र और पश्चिम बंगाल है। सामाजिक गतिविधि में आप किसान-मजदूर के जीवन संघर्ष का चित्रण करते हैं। लेखन विधा-कविता,कहानी,नाटक, लेख तथा पुस्तक समीक्षा है। कुछ समाचार-पत्र में आपकी रचनाएं छ्पी हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-शोध छात्र होना ही है। अत्रि की लेखनी का उद्देश्य-साहित्य के विकास को आगे बढ़ाना और सामाजिक समस्याओं से लोगों को रूबरू कराना है। इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक-रामधारीसिंह ‘दिनकर’ सहित नागार्जुन और मुंशी प्रेमचंद हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज- नागार्जुन हैं। विशेषज्ञता-कविता, कहानी,नाटक लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-
“भारत की भाषाओंं में है 
अस्तित्व जमाए हिन्दी,
हिन्दी हिन्दुस्तान की न्यारी
सब भाषा से प्यारी हिन्दी।”