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हो जाता कल्याण

अवधेश कुमार ‘आशुतोष’
खगड़िया (बिहार)
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घन भू पर वितरण करे,जल निधि का बन दूत।
जल लेकर गगरी कहे,निधि निंदित,मैं पूतll

रामायण,जयसंहिता,वेद ज्ञान भंडार।
सारे कवियों ने लिया,इनसे ज्ञान उधारll

कविगण जो भी बाँटते,सब है जूठा ज्ञान।
नहीं परोसा आज तक,एक नया पकवानll

जैसे बादल धूप में,ला देता है छाँव।
त्यों रज लाती ज्ञान है,छूते जब गुरु-पाँवll

सुख-दु:ख तो आता सतत,ज्यों आते दिन-रात।
यह छोटी-सी बात भी,नहीं बहुत को ज्ञातll

देरी से आती समझ,जो भी अच्छी बात।
फिर जो करता है अमल,वही श्रेष्ठ है तातll

देख चकित आँखें हुईं,अनुपम छवि श्रृंगार।
आई क्या रंभा उतर,सुरपुर से संसारll

दूजे में ढूंढा कमी,जीवनभर इंसान।
अगर स्वयं में ढूंढता,हो जाता कल्याणll

दिल जाकर दिल से मिला,रहा देर तक संग।
तन-मन पुलकित हो गया,और अंग-प्रत्यंगll

जब भी मैं होता दुखी,मित्र,मुकुर दे कंध।
दु:ख में ये होंगे दुखी,हुआ यही अनुबंधll

सूर्य-धूप होती प्रखर,वर्षा के पश्चात।
आतप करता मसख़री,नहला देता गातll

ये दोनों थकते नहीं,चाहे मर्द या बर्द।
आए दु:ख लाखों भले,इन्हें न होता दर्दll

इस जग की सीमा नहीं,है अनन्त विस्तार।
बिना आत्म,इस बुद्धि से,मुश्किल पाना पारll

परिचय-अवधेश कुमार का साहित्यिक उपनाम-आशुतोष है। जन्म तारीख २० अक्टूबर १९६५ और जन्म स्थान- खगरिया है। आप वर्तमान में खगड़िया (जमशेदपुर) में निवासरत हैं। हिंदी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले आशुतोष जी का राज्य-बिहार-झारखंड है। शिक्षा असैनिक अभियंत्रण में बी. टेक. एवं कार्यक्षेत्र-लेखन है। सामाजिक गतिविधि के निमित्त साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेते रहते हैं। लेखन विधा-पद्य(कुंडलिया,दोहा,मुक्त कविता) है। इनकी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें-कस्तूरी कुंडल बसे(कुंडलिया) तथा मन मंदिर कान्हा बसे(दोहा)है। कई रचनाओं का प्रकाशन विविध पत्र- पत्रिकाओं में हुआ है। राजभाषा हिंदी की ओर से ‘कस्तूरी कुंडल बसे’ पुस्तक को अनुदान मिलना सम्मान है तो रेणु पुरस्कार और रजत पुरस्कार से भी सम्मानित हुए हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-हिंदी की साहित्यिक पुस्तकें हैं। विशेषज्ञता-छंद बद्ध रचना (विशेषकर कुंडलिया)में है।

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