गोपाल मोहन मिश्र
दरभंगा (बिहार)
*****************************************
एक छोटे से गाँव में एक प्रतिभाशाली मूर्तिकार रहता था, जिसका नाम था रमेश। उसे मूर्तिकला से गहरा लगाव था, और उसने अपनी पूरी ज़िंदगी इस कला को समर्पित कर दी। सालों की मेहनत से उसकी कला इतनी निखर गई कि उसकी हर मूर्ति में जान-सी मालूम पड़ती थी। गाँव के लोग उसकी कारीगरी की तारीफ करते, और उसकी शोहरत दूर-दूर तक फैल गई।
रमेश की प्रसिद्धि बढ़ने के साथ उसमें घमंड भी जाग उठा। वह सोचने लगा, “मुझसे बेहतर मूर्तिकार दुनिया में कोई नहीं।” लोग उसे सम्मान देते, लेकिन उसका अहंकार उसे अंधा कर रहा था। एक दिन, उम्र के साथ उसने महसूस किया कि उसका अंतिम समय नजदीक आ रहा है। मृत्यु का डर उसे सताने लगा, और वह यमदूत से बचने की चाल सोचने लगा।
रमेश ने सोचा, “अगर मैं अपनी कला का जादू चला दूँ, तो शायद मौत से बच जाऊँ।” उसने दिन-रात मेहनत कर १० मूर्तियाँ बनाईं, जो बिल्कुल उसकी तरह दिखती थीं। जब ये मूर्तियाँ तैयार हुईं, तो वे इतनी सजीव लगीं कि कोई अंतर समझ ही नहीं पाया। रमेश इनके बीच जा बैठा और सोचा, “अब यमदूत मुझे कैसे पहचान सकता है I
जब यमदूत प्राण लेने आया, तो उसने ११ एक जैसे चेहरों को देखकर हैरानी जताई। उसने सोचा, “इनमें से असली कौन है ?” रमेश मुस्कुराया और मन ही मन बोला, “मेरी चाल काम कर गई।” लेकिन यमदूत समझदार था। उसने कहा, “ये मूर्तियाँ तो कला का चमत्कार हैं, लेकिन इनमें कोई खामी होगी। अगर असली मूर्तिकार सामने हो, तो मैं उसे बता सकता हूँ।”
रमेश का अहंकार फूट पड़ा। वह चिल्लाया, “खामी ? मेरी कला में कोई खामी नहीं हो सकती !” यमदूत ने तुरंत उसे पकड़ लिया और हँसते हुए कहा, “बेजान मूर्तियाँ चिल्लाती नहीं, तुमने खुद अपनी पहचान बता दी। तुम्हारा अहंकार ही तुम्हारी हार बना।” रमेश की आँखें खुली रह गईं, और यमदूत उसे यमलोक ले गया।
गाँव में इस घटना की चर्चा हुई। रमेश का बेटा, जो कला सीख रहा था, ने फैसला किया कि वह अपने पिता की गलती से सबक लेगा। उसने अपने गुरु से कहा, “पिताजी का घमंड उन्हें ले डूबा। मैं हमेशा विनम्र रहूँगा।” गुरु ने मुस्कुराकर कहा, “यही सच्ची कला की राह है।”
मेरे जीवन में व्यक्तिगत रूप से ऐसे व्यक्तियों और संस्थानों से मेरा वास्ता पड़ा है, मैंने उन्हें उनकी गलत नीतियों और कार्य करने के अस्वस्थ और मनमाने तरीके के बारे में चेताया और उसे परिवर्तित करने के सुझाव और सलाह दी। उन्होंने मुझे साधारण और बेकार समझकर मेरा और मेरी बातों का तिरस्कार किया एवं मुझे अपना साथ छोड़ने के लिए बाध्य किया।
मैं तो खुशी-खुशी हट गया, लेकिन उनका नामो-निशान कुछ ही समय में मिट गया, जबकि वो अपने क्षेत्र के दिग्गज थे और कई दशकों से बाजार एवं अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार, अग्रणी उद्यमी और संस्थान थे, वो फिर दोबारा कभी उठ नहीं सके।
कहने का तात्पर्य है कि दुर्मति और दुर्गति का चोली-दामन का साथ है। जहाँ एक होगी, दूसरी भी दिखाई पड़ेगी यह जुड़वां बहन है, इसलिए जहाँ दुर्मति मौजूद है दुर्गति होकर रहेगी। अहंकार और दुर्मति सगे भाई-बहन है, जो विनाश की कोख से उत्पन्न होते हैं।
मैंने बेहद समझदार और सफल लोगों को इसका शिकार होकर नष्ट होते देखा है। लोग अपनी सफलता और शक्ति के बोझ के नीचे दबकर मर जाते हैंI लोग इसे हज़म नहीं कर पाते हैं और उनकी शक्ति तथा सफलता ही उनके विनाश का कारण बन जाते हैं।
परिचय–गोपाल मोहन मिश्र की जन्म तारीख २८ जुलाई १९५५ व जन्म स्थान मुजफ्फरपुर (बिहार)है। वर्तमान में आप लहेरिया सराय (दरभंगा,बिहार)में निवासरत हैं,जबकि स्थाई पता-ग्राम सोती सलेमपुर(जिला समस्तीपुर-बिहार)है। हिंदी,मैथिली तथा अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले बिहारवासी श्री मिश्र की पूर्ण शिक्षा स्नातकोत्तर है। कार्यक्षेत्र में सेवानिवृत्त(बैंक प्रबंधक)हैं। आपकी लेखन विधा-कहानी, लघुकथा,लेख एवं कविता है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। ब्लॉग पर भी भावनाएँ व्यक्त करने वाले श्री मिश्र की लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक- फणीश्वरनाथ ‘रेणु’,रामधारी सिंह ‘दिनकर’, गोपाल दास ‘नीरज’, हरिवंश राय बच्चन एवं प्रेरणापुंज-फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शानदार नेतृत्व में बहुमुखी विकास और दुनियाभर में पहचान बना रहा है I हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान की प्रबल धारा बह रही हैI”