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आशियाना बिखर गया

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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अमेरिका की चमकती गलियों में सुरेश एक खुशहाल ज़िंदगी जी रहा था। वह विदेशी धरती पर नौकरी करता था, पर धड़कन हिंदुस्तान की मिट्टी के लिए धड़कती थी। उसकी दुनिया २ बेटों में बसती थी — ७ साल का आर्यन और ५ साल का अमन। पत्नी की हँसी ही उसके घर की रौशनी थी।
   सुरेश फौज का सिपाही था। छुट्टी लेकर जब घर आता, तो पूरा घर त्योहार बन जाता। देश से प्रेम उसे विरासत में मिला था, और परिवार से मोहब्बत उसकी इबादत थी। फोन पर रोज़ बच्चों से पूछता, “बेटा, पढ़ाई कैसी चल रही है ?”
एक दिन छुट्टी पर घर आया था। सब आँगन में बैठे हँस रहे थे कि अचानक मोबाइल की घंटी बजी। उधर से आर्मी ऑफिस की आवाज़ आई — “सुरेश, आज ही लौटो। कल युद्ध है।”
सुरेश ने दोनों बेटों को सीने से भींच लिया। माथा चूमकर बोला, “बेटा, माँ का ख्याल रखना। देश पहले है।” आँखें नम थीं, पर हौसला सीना ताने खड़ा था।
बैग पैक करते समय पीछे से आर्यन लिपट गया। काँपती आवाज़ में बोला, “डैडी, अगर आप युद्ध में मारे गए तो हम किसके होंगे ?”
  सुरेश ने उसके बाल सहलाए और बोला, “बेटा, देश के लिए शहीद होना गर्व की बात है। तुम भी बड़े होकर फौजी बनना।”
आरव ने आँसू पोंछकर कहा, “नहीं डैडी, मुझे फौजी नहीं बनना। जहाँ जान जाती हो, मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। मैं इसी घर को अपना ऑफिस बनाऊँगा और इंसानों की सेवा करूँगा।”
सुरेश चला गया। पीछे छूट गईं नम आँखें और अधूरा आँगन।
युद्ध छिड़ गया। सुरेश का हवाई जहाज़ पहाड़ों से टकराकर गिर पड़ा। बर्फीली चोटियों के बीच वह घायल पड़ा रहा। न पानी, न खाना, न कोई अपना। कई दिन बाद साथी उसे ढूँढ लाए, पर तब तक उसकी साँसें थम चुकी थीं।
उधर, खबर मिलते ही पत्नी का दिल धड़कना भूल गया। हार्ट अटैक ने उसे भी सुरेश के पास पहुँचा दिया।
एक झटके में २ बच्चे अनाथ हो गए-७ साल का आर्यन और ५ साल का अमन। आँगन में सिर्फ चीखें थीं, राख थी और एक सवाल — “युद्ध ने दिया क्या ?”
बस उजाड़ा हुआ घर, बिखरा हुआ आशियाना, और २ मासूम आँखों में सिमटा हुआ सन्नाटा…।