कंटक पथ में मानुष बनता
आशा आजाद`कृति`कोरबा (छत्तीसगढ़) ******************************************* कंटक पथ में मानुष बनता,कैसे मैं बढ़ पाऊँगी।पंख कतर कर रखते बोलो,कैसे मैं मुस्काऊँगी॥ निर्मल मन से स्वप्न सँजोए,इस धरती पर आती हूँ,सीमाओं का बंधन मन में,देख बहुत डर जाती हूँ।नन्हीं-सी बाला हूँ मैं तो,कैसे मैं समझाऊँगी,कंटक पथ में मानुष बनता,कैसे मैं बढ़ पाऊँगी…॥ करवट लेती उम्र नवलता,कहते सब मैं नारी … Read more