जल,वायु से सजतीं बहारें
हीरा सिंह चाहिल ‘बिल्ले’बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ************************************** रचना शिल्प:२२२ २२२ १२२ जल,वायु से सजतीं बहारें,धरती में इनसे ही नजारे।मधुरम बनके धरती गगन को,बूंदों की चाहत में निहारे॥जल,वायु से… बूंदें,बादल देता धरा को,बिन बूंदों के सूखी धरा हो।कैसे फिर सज पाए धरा ये,मिलती ही न इसको कदर तो,कैसे सज पाएंगी बहारें।जल,वायु से… सूखीं नदियां,वन-वृक्ष कटते,झुलसें पर्वत,हिम भी … Read more