गर्मी

राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’ धनबाद (झारखण्ड)  ************************************************************************** सर्दी जाती गर्मी आती, शुरू शुरू में यह सबको भाती। स्वेटर रजाई को दूर भगाती, जब वह अपने रंग में आती… सबको वह पूरा पूरा सताती॥ सूरज का रहता है प्रचंड रूप, बेहाल करता है जीवो को इसका धूप। बचने को ढूंढते हैं सब सुंदर छाया, कम ना … Read more

कत्लेआम

सुलोचना परमार ‘उत्तरांचली देहरादून( उत्तराखंड) ******************************************************* आज भावनाओं का भी देखो ऐसे कत्लेआम होता है। घर में मारकर बीबी को वो, बाहर खूब जोर से रोता है। ऐसे कत्लेआम… बेटी को भी ना छोड़े ये, ऐसा पिता भी होता है। लगे धब्बे जो दामन पे, सरेआम वो धोता है। ऐसे कत्ले आम… भाई का भाई … Read more

आत्मजा

विजयलक्ष्मी विभा  इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश) ********************************************************* आत्मजा खंडकाव्य से अध्याय-९ विधि को सुखद लगी यह जोडी, उसने आँखें चार करायीं यह कैसा संयोग अजब था, नजरें भी तलवार बनायीं। लगीं काटने वे सपनों को, देखा करती थी जो प्रति पल हमला करतीं आदर्शों पर, जिनसे रहता था मन उज्जवल। कभी कनखियों से वह देखे, कभी देखती उसे … Read more

भ्रूण हत्या बड़ा अपराध

विजय कुमार मणिकपुर(बिहार) ****************************************************************** भ्रूण हत्या है बड़ा अपराध इसे रोकें हम और आप, लड़का-लड़की में अंतर नहीं फिर क्यों होते है इतने अपराध। काजल नहीं सुंदरता का लो कालिख तुम पोत, ऐसा रूप सहेज लो जो हो सुंदरता का प्रतीक। माता तो माता होती है क्यों अपराधी के रूप, ऐसी गलती ना करो जो … Read more

अधीन

डाॅ.आशा सिंह सिकरवार अहमदाबाद (गुजरात )  **************************************************************** अधीन बहुत गहरे, मानदंड पितृसत्तात्मक मान-प्रतिष्ठा के नीचे दबी कुचली किरकिरी-सी, नहीं रत्तीभर जगह समा जाए वह पीठ वजन भर, खड्डे में उड़ेल भर लौटी प्राण-प्रतिष्ठा जगत में उपहास वह रोई, खुद ही देखी पराधीनता के भंवर में उठती धीरे-धीरे चिंगारी, किस दिशा अधीर अजीब छटपटाहट, पीड़ा से … Read more

उसके नाम से

सुश्री अंजुमन मंसूरी ‘आरज़ू’  छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) ********************************************************************************************* जब-जब गले मिलेंगे यूँ पंडित इमाम से, गोहर मिलेंगे देश को अब्दुल कलाम से। ऐसी हवा चली है सियासत की आजकल, कोई ख़फ़ा अज़ां से कोई राम-राम से। मेहनत से हुई शीश महल जब ये झोपड़ी, पत्थर उछालता है कोई इंतक़ाम से। कल रात जाग-जाग सुलाई थी … Read more

‘मत’ की राजनीति

राजबाला शर्मा ‘दीप’ अजमेर(राजस्थान) ******************************************************************************************** वायदों की फेहरिस्त बनाकर, जनता को नेता लुभा रहे हैं। झूठे-झूठे दिखा के सपने, सबको मूर्ख बना रहे हैं। अच्छे दिन तो कभी न आये, ना ही अच्छे दिन आयेगें। भरमा अपने वाग्जाल से, वाह! वाह! अपनी करा रहे हैं। बेरोजगारों को वेतन भत्ता, खातों में जमा होगा पैसा। नौकरी … Read more

जिंदगी

प्रदीपमणि तिवारी ध्रुव भोपाली भोपाल(मध्यप्रदेश) **************************************************************************** (रचना शिल्प:बह्र/अर्कान-२१२×४-फाउलुन×४) ज़िन्दगी आजमाती है इंसान को। वो परखती है इंसाँ के ईमान को। ज़िन्दगी हादसा खूबसूरत कहें, ज़िल्लतें बस दिखें यार नादान को। आम औ ख़ास दुनिया में सब लुट रहे, लूटने कुछ चले आज भगवान को। आसमाँ से बड़े भी मुख़ातिब हुए, जो ख़ुदा कह रहे आज धनवान … Read more

जंगल के हम हैं फूल

डॉ.जयभारती चन्द्राकर भारती गरियाबंद (छत्तीसगढ़) *************************************************************************** जंगल के हम हैं फूल’ सदा हँसते और लहलहाते हैं ना हमें खाद की जरूरत, ना हमें ही नित पानी चाहिए बिना किसी देखभाल के, दिखते हैं कितने सुन्दर। जंगल के हम हैं फूल… ना किसी का संरक्षण, ना ही किसी का दुलार फिर भी हम जी लेते हैं, अपनी … Read more

मजदूर की आवाज

ओमप्रकाश अत्रि सीतापुर(उत्तरप्रदेश) ********************************************************************************* बदलते समय में बदलते रहेंगे, जीवन के दुर्गम मार्गों पर चलते रहेंगे, पूंजी की समरसता से, लड़ते रहेंगे। पिस नहीं पाएंगे, धन के पाटों के बीच, सह नहीं पाएंगे तुम्हारे पैरों की ठोकर, अब अपनी आवाज से तुम्हारी सोई हुई चेतना को, जगाते रहेंगे। होते विकास बदलते समाज में, कम मजदूरी … Read more