‘माॅं’ का जाना…

रश्मि लहरलखनऊ (उत्तर प्रदेश)************************************************** अचानक बदरंग हो जाता हैमौसम,शून्यता पसर जाती हैउस आँगन में,जहाॅं बरसों तलकसुनती रही बिटिया,कि वह ईश्वर कीसबसे सुन्दर कृति है। अनमने मन में,बन जाता हैविसर्जित लम्हों का पहाड़। अनुभवों की टूटन और,आत्मीय-स्नेहीस्मृतियों की जकड़नटीसती दिनचर्या को,बेमुरव्वत ज़िम्मेदारी से भर जाती है। सुनो,कुलबुलाहट भरी इंसानीभीड़ के मध्य…,आशीर्वाद देते।दो अद्भुत हाथों का अदृश्य … Read more

अटल सत्य ‘अटल जी’

संजय वर्मा ‘दृष्टि’ मनावर(मध्यप्रदेश)**************************************** ‘अजात शत्रु’ अटल जी… अटल सत्य,जो समा जाताहर एक स्मृति पटल पर। अच्छाई के विचारों पर,मानव के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूपचिंतन करते मानव,मानव अटल मूर्ति कोक्षण भर की वैराग्यता,फिर से समा जातीअस्थिर मन में। यही संकेत फिर से,हमें याद दिलाताअटल जी के कार्यपोखरण परीक्षण,गा रहा आज विकास की गाथा।बस यही तो वर्तमान में,अटल … Read more

पूस की रात

प्रो.डॉ. शरद नारायण खरेमंडला(मध्यप्रदेश)******************************************* दोस्तों! सुनो वह ‘पूस की रात’ थी,जब का यह आज वाला किस्सा हैबस इतना समझ लीजिए आप कि,कि वह अब ज़िन्दगी का हिस्सा है। मेरे परिजन वर्षों से थे किसानी करते,हल चला अन्न उगा सबका पेट भरतेचाहे हो पूस की रात वे खेत रखाते,पशुओं से अपने फसल-खेत बचाते। तो एक बार … Read more

सर्द हवाओं का आलिंगन

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* सर्द हवाओं का आलिंगन, सिहरन तन-मन कर जाता है,बहुगर्म वसन उष्मित काया, नवप्रीत मिलन सुख पाता है।मन्द-मन्द गन्धमाद सुगन्ध, पल-पल रोमांच दिलाता है-रति राग प्रखर अनुराग शिखर, नवनीत मुखर मुस्काता है॥ तिमिरान्ध ओस फैले चहुँ दिशि, हिमपात धवल छा जाता है,तन-बदन एक आनंदित मन, ठिठुरन अतिरेक दिखाता है।हौले-हौले बहती … Read more

घटित होती कविताएँ

संजीव एस. आहिरेनाशिक (महाराष्ट्र)*************************************** यहाँ घट-घट पे घटित हो रही कविताएँ हैं,कवि कब तक मौन रहे, मचली सब दिशाएँ हैं। ये सावन की वादियाँ, गदरा गईं हैं ऐसी,सब तरफ भरी फिजाओं में चहल-पहल हैये पहाड़, ये नदियाँ, ये झरझराते झरने,जीवित हो उठे हैं और बोलते कल-कल हैं।हर पल प्रकृति में खिल रही नयी ऋचाएँ हैं,यहाँ … Read more

कैसे होगा राष्ट्र विकास ?

ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’अलवर(राजस्थान)*************************************** मुफ्तखोरी और राष्ट्र का विकास…. बढ़ रही है मुफ्तखोरी,कैसे होगा राष्ट्र का विकास ?अन्तर्मन में प्रेम नहीं है,बढ़ रही है सिर्फ खटास। हराम की अंधी कमाई से,कैसे होगा जीवन पास ?भ्रष्टाचारी भक्षक बन कर,लूट रहे हैं दिन और रात। देश हमारा लाचार हुआ है,गरीब हो रहा जिंदा लाशन्याय व्यवस्था अपंग हो गई,कैसे … Read more

‘मुफ्तखोरी’ से बचना होगा

धर्मेंद्र शर्मा उपाध्यायसिरमौर (हिमाचल प्रदेश)******************************************************* मुफ्तखोरी और राष्ट्र विकास… देश खोखला कर रही,सबको बना रही हरामखोरयह मुफ्तखोरी की आदत,सबको बना रही फरामोश। बिन मांगे जब मिलना खाना,कुत्ता भी फिर क्यों दुम हिलाए ?अपने ही घर में पड़ा रहे,अपने ही स्वामी को चिढ़ाए। मुफ्त में जब बिल्ली को मिलता,चूहे को फिर वो क्यों खाए ?चाहे मूषक … Read more

झम-झम सावन

सरोजिनी चौधरीजबलपुर (मध्यप्रदेश)********************************** झम-झम सावन,बरसे आँगनहर्षित चेतन,सुरभित उपवन। प्रभु का शासन,कितना पावनपानी छन-छन,सुख सम्मोहन। झूलें सब जन,करते गायनबादल गर्जन,उर में कम्पन। हैं मोर मगन,करते नर्तनपुलकित जीवन,हो परिवर्तन। शोभित यौवन,लज्जित आननअलकें मादन,आए साजन। लिपटा तन-मन,है मौन बयन।अंतर का धन,मेरा अवलम्बन॥

सृजन का ये जुनून

डॉ. श्राबनी चक्रवर्तीबिलासपुर (छतीसगढ़)************************************************* जीवन की ये लंबी डगर,कभी धीमी-कभी तेज़ रफ़्तारसिमटी लम्हों में तो, कभी खींच तान,सुबह से शाम न होती एक समान। कठिन है यहाँ हर कदम,चौकन्ना रहना पड़ता है हर वक्तन जाने कब कौन किधर,लगा दे घात पीछे से असरदार। विश्वास पर टिका है हर संबंध,डर लगता है अब विश्वास तुझ परअच्छे-अच्छों … Read more

नफ़रत क्यों अपनों से ?

कमलेश वर्मा ‘कोमल’अलवर (राजस्थान)************************************* अनजान-सा हो गया है जीवन का ये सफ़र,बदल सी गई है ये सुहानी सी डगर। वो भी दिन थे जब गैर भी अपने होते थे,आज अपने भी पराए से होकर रह गए हैं। जीवन की इस भाग-दौड़ में कोई नहीं रहा अपना,बदल-सा गया है जीवन का हर एक सपना। न जाने … Read more