ग्रीष्म
डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)********************************** ग्रीष्म अवतरित हो रही,सूरज करता हास।अपनी परिमल छोड़कर,जाने को मधुमास॥ मैं बलशाली कह रहा,अधर भरे मुस्कान।अरे ग्रीष्म का राज है,सूरज को अभिमान॥ नींबू जल पीते रहो,अमृत है यह पेय।ग्रीष्म काल का है मधुर,सरल,सुलभ पाथेय॥ छत पर जल रखिये सदा,ग्रीष्म कर रहा जोर।खग पीकर जिस नीर को,गीत सुनाते भोर॥ ग्रीष्म फेंकता जाल जब,तन … Read more