खामोश पल

डॉ. वंदना मिश्र ‘मोहिनी’इन्दौर(मध्यप्रदेश)************************************ समय,वक्त,पलों का अकेलापन,यह सब रिक्तता में…उनसे गुफ्तगू करतें तो होंगेंहृदय में उनके सुकून,अपना घर बना लेता होगा। जब अपनों का,साथ उन्हें याद आता होगाहृदय में उनके भी,चुभती होगी कोई फाँस…जब प्रेमी परिंदे,अपना घरौंदा बनाते होंगे। कुछ अपनों का विरह,उन्हें भी पीड़ा देता होगा…पर जो उनके साथ बीते लम्हें,उनके अकेलेपन को…राहत से … Read more

लघुकथाकार डॉ. सतीशराज पुष्करणा नहीं रहे

दिल्ली। हिन्दी लघुकथा साहित्याकाश के दैदीप्यमान सूर्य और पितामह डॉ. सतीश राज पुष्करणा (महेन्द्रु पटना) नहीं रहे। लघुकथा जब संघर्ष के दौर में थी तो,डॉ. सतीशराज ने लेखन का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया। व्यवसाय से प्रकाशक और अन्तःकरण से महान लघुकथाकार और लघु कथा विधा के पितामह डॉ. पुष्करणा का पंचतत्त्व में विलीन होना … Read more

क़ुदरत के करिश्मे

तारा प्रजापत ‘प्रीत’रातानाड़ा(राजस्थान) ****************************************** बिन आधार,खड़ी है धरतीबिन खम्बे आकाश,समझा कोई न आज तकपंडित-ज्ञानी-ध्यानी,क़ुदरत के करिश्मे परकैसे न हो हैरानी ? फूलों पर मंडराती फिरतीरंग-बिरंगी तितली,बादल छाए आसमान मेंऔर चमकती बिजली,कहाँ से बरसा है पानी ?क़ुदरत के करिश्मे पर,कैसे न हो हैरानी…? कैसे चमकते आसमान परसूरज-चाँद-सितारे,आपस में वो कभी न लड़तेमिल-जुल रहते सारे,लगती है एक कहानी।क़ुदरत … Read more

एक छोटा-सा गाँव

वाणी वर्मा कर्णमोरंग(बिराट नगर)****************************** एक छोटा-सा गाँव,सीधे-सादे लोगशीतल हवा पीपल की छाँव,खेतों में उपजते धान और धान से उपजती खुशियाँमन में संतोष और मेहनत से खिलता गाँव,ना छल-कपट ना दुष्टताप्रेम की भाषा और लोगों का जुड़ाव,वसुधैव कुटुम्बकम्-सीलोगों की मिलनसारिता और कोमल भाव,सबके सुख-दुःख में होते शामिलसंयुक्त परिवार और परिवारों से परिपूर्ण होता गाँव। बदला गाँव … Read more

शुद्ध-सात्विक भोजन लें हम

अमल श्रीवास्तव बिलासपुर(छत्तीसगढ़) *********************************** जग में व्याप्त कुपोषण की,स्थिति कर देती विचलित है।आठ अरब जनसंख्या में से,अस्सी कोटि प्रभावित हैं॥ तन में,मन में,बुद्धि-चित्त में,पड़ी कुपोषण की छाया।बुद्धि-भ्रमित,तन-कृश,मन-दूषित,चित्त सभी का बौराया॥ चंद्र लोक से मंगल गृह तक,नभ में मानव विचर रहा।किन्तु धरा में कहीं-कहीं वह,भूख,प्यास से बिफर रहा॥ हो अनाज की कमी धरा में,है ऐसा परिदृश्य नहीं।लेकिन … Read more

कोमल मन नारी

डॉ.एन.के. सेठीबांदीकुई (राजस्थान) ********************************************* (रचना शिल्प:७ भगण (ऽ।।) + गुरु से यह छन्द बनता है,१०,१२ वर्णों पर यति होती है। इसमें वाचिक भार लेने की छूट नहीं है। मापनी- २११ २११ २११ २,११ २११ २११ २११ २) कोमल है मन नारि सदादृढ़ता पर अद्भुत है इसकी।संकट से घबराय नहीं,रहती यह नार प्रिया सबकी॥शक्ति यही कहलाय … Read more

प्यार के किस्से

सरफ़राज़ हुसैन ‘फ़राज़’मुरादाबाद (उत्तरप्रदेश) ***************************************** प्यार के क़िस्से हमारे जिन ख़तों में क़ैद हैं।ख़त वो सारे अब हमारी फ़ाइलों में क़ैद हैं। बोलबाला जुर्म का है मुजरिमों की ‘भीड़ है,कौन कहता है के हम अपनी ह़दों में क़ैद हैं। भूख तारी,प्यास ग़ालिब,बेसरो सामां हैं हम।कितनी दुश्वारी से हम अपने दरों में क़ैद हैं। एक ख़ालिक़ ‘एक … Read more

सुध खो देती हूँ

श्रीमती देवंती देवीधनबाद (झारखंड)******************************************* जब-जब बजाते कृष्ण बाँसुरी,गृहकार्य नहीं कर पाती हूँ,जब सुनती हूँ बाँसुरी की मधुर धुन,मंत्रमुग्ध हो जाती हूँ। ओ मनमोहना श्री कृष्णा काहे को बाँसुरीया बजाते हो,घर में मन नहीं लगता है,पिया से तुम कलह करवाते हो। क्यों बाँसुरी की धुन सुना के मुझे जमुना तट बुलाते हो,मन बावरी हो जाता है,जब … Read more

मेरी संवेदनाएं

असित वरण दासबिलासपुर(छत्तीसगढ़)*********************************************** मेरी संवेदनाएं गहरी झील में तैरतेउस कमल की तरह विकसित नहीं हो पाती,जिसने देखा हो रातभरखामोश कुहरों का जुल्म,और देखा हैओस की बूंदों का सामूहिक जन्म।फिर भी,रात की परतों में से उभरतेऊष्माहीन सूरज की प्रभा लिए,मेरा अंतर्मन ढूंढता फिरता हैप्रेम की हर परछाईं को,ढूंढता है ठहरावपाना चाहता है एक नमी,सूखी रेत की … Read more

बढ़ता प्रदूषण,बढ़ता संकट

रोहित मिश्रप्रयागराज(उत्तरप्रदेश)*********************************** आज के आधुनिक युग में जैसे-जैसे लोगों की जरुरत बढ़ती जा रही है,वैसे-वैसे ही पर्यावरण पर लोगों की आकांक्षाओं का भार भी बढ़ता जा रहा है। नित नई सुख-सुविधाओं की चाहत में लोग उत्पादन साम्रग्री के दुष्प्रभाव से अनजान होकर उभोक्ता की भूमिका में पर्यावरण को संकट ग्रस्त कर रहे हैं।आज ऐशो-आराम के … Read more