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बूझ-अबूझ पहेली जीवन

योगेन्द्र प्रसाद मिश्र (जे.पी. मिश्र)
पटना (बिहार)
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सृष्टि करना जीवधारियों की परम आवश्यकता और कर्त्तव्य है। यह सभी जीवों में और मनुष्य मात्र में लागू है। जीवन और मरण प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। मरण के कारण जीवन की हुई क्षति की पूर्ति जग में करते रहने के लिए सृष्टि की प्रक्रिया चालू रहती है। प्राचीन काल से इसके लिए विवाह की संस्था कायम की गई है,ताकि नर और नारी दोनों मिलकर अपनी कामना की पूर्ति के क्रम में सृष्टि भी करते रहें। हमारे मनिष्वियों ने सृष्टि क्रिया के गूढ़ रहस्यों को अनादिकाल से खोलकर हमारे समक्ष रख दिया है। स्त्री-पुरुष के समागम से जो जैविक क्रिया स्त्री के शरीर में होती है,वही सृष्टि के प्रकटीकरण का द्योतक है। वैज्ञानिक तथ्य भी है कि जब स्त्री-पुरुष में समागम होता है तो सृष्टि की शुरूआत होती है।
आज जब नए लड़के-लड़की,दोनों शिक्षा ग्रहण में समान रूप से जुड़े हुए हैं और नौकरी या व्यवसाय में उन्हें समान रूप से अवसर उपलब्ध होता है, फलतः दोनों अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम हैं और खासकर लड़कियों को जीवन-यापन के लिए लड़कों पर निर्भर रहने की विवशता नहीं होती हैl फिर दोनों चाहते हैं कि उनका एक अलग संसार हो,जिसमें वे सृष्टि के माध्यम से अलग प्राणी दे सकें और उनकी पहचान इसी प्रक्रिया से बनी रहेl इसीलिए-
‘प्रेतो मुञ्चामि नामुत: सुबद्धाममुतस्करम्।
यथेयमिन्द्र मीढ्व: सुपुत्रा सुभगासतीll’ (ऋक्.१०/८५/२५)

‘पितृकुल से मुक्त कर हे कन्या,
हम पतिकुल से तुझे जोड़ते हैं।
हे इन्द्र जिससे हो यह सौभाग्यवती,
सुपुत्रोंवाली! यही आपसे माँगते हैंll’
और
‘इह प्रियं प्रजया ते समृध्यताम्,
अस्मिन गृहे गार्पत्याय जागृहि।
एना पत्या तन्वं१शं सृजस्वाधा,
जिव्री विदथमा वदाथःll’ (ऋक्.१०/८५/२७)

इस घर में प्रिय संतति को जन्म देकर,
सदा जागरूक रहें गृहस्थ धर्म के लिए।
स्वामी के साथ रहें दोनों एक होकर-
वृद्धावस्था में उपदेश करें,नित्य कर्म के लिएll

तब,इस परिस्थिति विशेष में देरी से शादी करने के कुछ दुष्परिणाम भी कहीं-कहीं देखने को मिलते हैं,जैसे मत-भिन्नता और संतान होने में देरी या जुड़वां बच्चे की पैदाइश। सुखद दाम्पत्य-जीवन के लिए संतान का बंधन भी एक अच्छा कारक है जो सृष्टिकरण से ही संभव है। सृष्टि की रचना और उत्पत्ति के प्रसंग में यह महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि,संसार में कोई रचना व उत्पत्ति बिना कर्ता के नहीं होती। यह भी महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि कर्ता को अपने कार्य का पूरा ज्ञान होने के साथ उसे संपादित करने के लिए पर्याप्त शक्ति और बल भी होना चाहिए। क्या संसार में ऐसी अदृश्य सत्ता हो सकती है,जिससे यह सृष्टि बनी है ? इस पर विचार करने से हमारा ध्यान स्वयं अपनी आत्मा की ओर जाता है। हम एक ज्ञानवान चेतना तत्व पदार्थ हैं,जो शक्ति और बल से युक्त है। हमने स्वयं को आज तक नहीं देखा। आइने में भी हम अपने को उल्टा ही देखते हैं,अर्थात् हमारा दाहिना भाग बायां प्रतीत होता है। हम जो इस शरीर में रहते हैं व इस शरीर द्वारा अनेक कार्यों को संचालित करते हैं,वह आकार,रूप और रंग में कैसा है ? हम अपने को ही क्यों लें,हम अन्य असंख्य प्राणियों को देखते हैं,परन्तु उनके शरीर से ही अनुमान करते हैं कि इनके शरीरों में भी जीवात्मा है,जिसके कारण इनका शरीर कार्य कर रहा है। इस जीवात्मा (या प्राण) के माता के गर्भ में संयुक्त होना और संसार में आना ही जन्म कहलाता है और जिस चेतन जीवात्मा के शरीर से निकल जाने पर ही यह शरीर मृतक का शव कहलाता है। यह धारणा है कि बीज वृक्ष से पहले होता है। शरीर में जिस प्रकार की ज्ञानपूर्वक सृष्टि रची गई है,उसको देखकर आश्चर्य होता है। भीतर में हाड़ों का जोड़,नाड़ियों का बंधन,माँस का लेपण,चमड़ी का ढक्कन,प्लीहा,यकृत,फेफड़ा,श्वांस-प्रश्वांस क्रिया का स्थापन,रुधिर शोधन, प्रचालन,विद्युत का स्थापन,जीव का संयोजन,इंद्रियों के मार्गों का प्रकाशन,कला,कौशल व स्थापनादि अद्भुत सृष्टि की रचना है। जितने भी प्राणी एवं उद्भिज जीव हैं,सबमें सृजन प्रक्रिया चालू रहती है। अगर किसी अंश का क्षरण होता है,तो उसकी जगह और सृजन हो जाता है। इसीलिए,सृष्टि जितनी जटिल है,उतनी ही अपरिहार्य है। अपने को भविष्य में भी बनाए रखने के लिए यह एक अवश्यमभावी कार्य है। यही कार्य हमारे पूर्वजों द्वारा भी संपादित हुआ है और आगे भी रहेगा। जीवन अनमोल रत्न है,इसकी सततता के लिए सृष्टि आवश्यक है। हम सृष्टि की बूझ-अबूझ पहेली को समझें और अपने संस्कारों को जागृत करते हुए इसके लिए अपने को समर्पित करेंl

परिचय-योगेन्द्र प्रसाद मिश्र (जे.पी. मिश्र) का जन्म २२ जून १९३७ को ग्राम सनौर(जिला-गोड्डा,झारखण्ड) में हुआ। आपका वर्तमान में स्थाई पता बिहार राज्य के पटना जिले स्थित केसरीनगर है। कृषि से स्नातकोत्तर उत्तीर्ण श्री मिश्र को हिन्दी,संस्कृत व अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान है। इनका कार्यक्षेत्र-बैंक(मुख्य प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त) रहा है। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन सहित स्थानीय स्तर पर दशेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए होकर आप सामाजिक गतिविधि में सतत सक्रिय हैं। लेखन विधा-कविता,आलेख, अनुवाद(वेद के कतिपय मंत्रों का सरल हिन्दी पद्यानुवाद)है। अभी तक-सृजन की ओर (काव्य-संग्रह),कहानी विदेह जनपद की (अनुसर्जन),शब्द,संस्कृति और सृजन (आलेख-संकलन),वेदांश हिन्दी पद्यागम (पद्यानुवाद)एवं समर्पित-ग्रंथ सृजन पथिक (अमृतोत्सव पर) पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सम्पादित में अभिनव हिन्दी गीता (कनाडावासी स्व. वेदानन्द ठाकुर अनूदित श्रीमद्भगवद्गीता के समश्लोकी हिन्दी पद्यानुवाद का उनकी मृत्यु के बाद,२००१), वेद-प्रवाह काव्य-संग्रह का नामकरण-सम्पादन-प्रकाशन (२००१)एवं डॉ. जितेन्द्र सहाय स्मृत्यंजलि आदि ८ पुस्तकों का भी सम्पादन किया है। आपने कई पत्र-पत्रिका का भी सम्पादन किया है। आपको प्राप्त सम्मान-पुरस्कार देखें तो कवि-अभिनन्दन (२००३,बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन), समन्वयश्री २००७ (भोपाल)एवं मानांजलि (बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन) प्रमुख हैं। वरिष्ठ सहित्यकार योगेन्द्र प्रसाद मिश्र की विशेष उपलब्धि-सांस्कृतिक अवसरों पर आशुकवि के रूप में काव्य-रचना,बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के समारोहों का मंच-संचालन करने सहित देशभर में हिन्दी गोष्ठियों में भाग लेना और दिए विषयों पर पत्र प्रस्तुत करना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-कार्य और कारण का अनुसंधान तथा विवेचन है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचन्द,जयशंकर प्रसाद,रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और मैथिलीशरण गुप्त है। आपके लिए प्रेरणापुंज-पं. जनार्दन मिश्र ‘परमेश’ तथा पं. बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’ हैं। श्री मिश्र की विशेषज्ञता-सांस्कृतिक-काव्यों की समयानुसार रचना करना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“भारत जो विश्वगुरु रहा है,उसकी आज भी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हिन्दी को राजभाषा की मान्यता तो मिली,पर वह शर्तों से बंधी है कि, जब तक राज्य का विधान मंडल,विधि द्वारा, अन्यथा उपबंध न करे तब तक राज्य के भीतर उन शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा, जिनके लिए उसका इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था।”

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