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शीर्षक-तुम बनो कान्हा मनभावन

तुम बनो कान्हा मनभावन,
मैं अधरों पर शोभित बांसुरी
तुम लय ताल सखे,
मैं राधिका गीत लय की।

नदिया की लहर जल बूंदों-सा,
छ्ल-छ्ल बहता हृदय सरल
प्रकृति के इस उपवन में,
खिलखिलाता पुष्प सुरभित पवन
कोयल की कुहू, भ्रमरों का गुंजन,
नाचे मयूर सतरंगी मन।
तुम बनो कान्हा मनभावन…

जीवन की ये जटिल ग्रंथियाँ,
सुलझाए तन से मन से
कुछ सुर रहे इस काल चक्र में,
नुपुर बजे झुन छन नन…
रह जाएगी ध्वनि इनकी,
मन मस्तिष्क के स्मृति पट पे।
तुम बनो कान्हा मनभावन…

चिरकाल से आस है व्याकुल,
भ्रमित यहाँ मानव सकल
हृदय द्रवित, तृष्णा प्रबल,
मानवता पैठी व्यथा मर्म अटल
रागिनी स्नेह सुमधुर जो छिड़े,
मृदुल भाव जो जग जाए
चन्दन हृदय जग प्राणी का,
सत्यम शिवम की हो अनुभूति
पल जो अभिनन्दन हो जाए,
मैं संवेदनाओं की उमड़ती नदिया
संगम सागर से हो जाए
तन पावन मन पावस हो,
जीवन लक्ष्य जो मिल जाए।
तुम बनो कान्हा मनभावन,
मैं अधरों पर शोभित बांसुरी।
तुम बनो लय ताल सखे,
मैं राधिका गीत लय की॥

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