उज्जैन (मप्र)।
वर्तमान समय में हिंदी साहित्य की विधाओं में लघुकथा अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा रही है। कम शब्दों में गहरी संवेदना, सामाजिक यथार्थ और तीखा संदेश देने की क्षमता के कारण लघुकथा समकालीन साहित्य की महत्वपूर्ण विधा बनकर उभरी है।
यह विचार प्रेमचंद सृजन पीठ और सरल काव्यांजलि साहित्यिक संस्था द्वारा भारतीय ज्ञानपीठ महाविद्यालय में आयोजित ‘समकालीन लघुकथा और आज का परिचदृश्य’ विषय पर हुए विमर्श में मुख्य वक्ता लघुकथा जगत के हस्ताक्षर डॉ. ध्रुव कुमार (पटना) ने व्यक्त किए।
अध्यक्षता करते हुए समालोचक डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने अतीत से लेकर वर्तमान समय तक की लघुकथा का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि लघुकथा समुद्र की बूँद की तरह सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती है। आपने कहा कि लघुकथा में प्रतीकात्मकता, साहितिकता, शब्दों की सादगी, प्रयोगधर्मिता का होना आवश्यक है।
विशेष अतिथि लघुकथाकार सन्तोष सुपेकर ने कहा कि लघुकथा के
उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक को विश्व दृष्टि विकसित करनी होगी, चेतना सम्पन्नता दर्शानी होगी। विशेष अतिथि फिल्म समीक्षक शशांक दुबे ने कहा, कि आज की लघुकथा के विषयों में नवीनता होना जरुरी है और पाठक को लघुकथा पड़ते हुए अंत का आभास बिलकुल नहीं होना चाहिए।
इस अवसर पर डॉ. कुमार का सम्मान काव्यांजलि के अध्यक्ष डॉ. संजय नागर, सचिव मानसिंह शरद तथा जैन कवि संगम की ओर से अध्यक्ष सुगनचंद जैन आदि द्वारा किया गया। आयोजन में शहर के लघुकथाकार डॉ. वंदना गुप्ता, डॉ. हरीश कुमार सिंह, मुकेश जोशी, संदीप ‘सृजन’ और अनिल पांचाल, आदि ने अपनी प्रभावी लघुकथाओं का पाठ किया।
स्वागत भाषण पीठ के अध्यक्ष मुकेश जोशी ने दया। संचालन डॉ. हरीशकुमार सिंह ने किया। आभार डॉ. वंदना गुप्ता ने माना।