आराध्य राम 

मनोरमा जैन ‘पाखी’
भिंड(मध्यप्रदेश)
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तुम कल भी आराध्य थे,
आज भी आराध्य हो
मर्यादा पुरुषोत्तम तुम
कल भी थे,आज भी हो।
पर पूछती हूँ तुमसे आज ये प्रश्न,
अहिल्या का उपकार किया
तब भी साथ थी आपकी,

राक्षसों के नाश में
साक्षी थी आपकी।
आपके प्रेम,पर था अटूट विश्वास,
पल भर भी न सोचा
चली आई साथ तुम्हारे,
तुम्हारे पथ की पथिक बन।
पाथेय पाया तुमने साथ मेरे,
पर,क्या मेरी मर्यादा का
रक्षा का भार,तुम उठाने में,
अक्षम थे……क्यों ?
गर्भिणी,राजकुल का वंशज,
साँस ले रहा था मेरे अंदर
क्षण भी न विचारा प्रियतम,
त्यागना ही था,त्याग देते।
अपने अंश का कुछ ख्याल कर लेते,
कहीं कुटिया में रहने देते
छल से भिजवाया मुझे,
क्यूँ…आज सवाल तुमसे नहीं
पुरूष जाति से है।
तुम्हारा गलत कर्म,गलत नहीं,
जबकि हर कोई राम नहीं
हमेशा ही नारी हाशिए पर,
क्या उसकी पावनता कोई अर्थ नहीं।
एक बार,सिर्फ एक बार,
जान लेते उन पेड़-पादपों से
वर्षा की तरू तल लड़ियों से,
अंगार बरसाती दोपहर से,
या उमस भरी शामों से
कोई तो बताता सत्य तुम्हें,
पर नहीं,तुमको जाना था
महानता के शिखर पर।
जगत् पूज्य बनना था,
जाओ,किया माफ तुमको
तुम्हारे जघन्य कृत्य के लिए,
पर याद रखना समय बदलेगा,
विचार बदलेंगे।
आज जिन्होंने उठाई उंगलियाँ,
 कल तुमको भी न छोड़ेंगे
पूछेंगे मेरे परित्याग की कहानी।
दोहराएंगे सवाल बार-बार,
तार-तार करेंगे हर बार
तब क्या दोगे जबाब,
राम,मेरे राम,तनिक विचारो।
नहीं चाहती कि उठे कोई इंगित,
फिर से तुम्हारी तरफ
लो,करती हूँ आज मैं ही,
अपना सर्वस्य त्याग।
हे पृथा,समा ले मुझे,
न रहे कोई झंझावात्
न उठे रघुवीर पर फिर,
कोई सवाल के बाण।
किया उन्होंने पालन,
स्वराज धर्म का
रखा मान रघुकुल गौरव का…॥
परिचय-श्रीमती मनोरमा जैन साहित्यिक उपनाम ‘पाखी’ लिखती हैं। जन्म तारीख ५ दिसम्बर १९६७ एवं जन्म स्थान भिंड(मध्यप्रदेश)है। आपका स्थाई निवास मेहगाँव,जिला भिंड है। शिक्षा एम.ए.(हिंदी साहित्य)है। श्रीमती जैन कार्यक्षेत्र में गृहिणी हैं। लेखन विधा-स्वतंत्र लेखन और छंद मुक्त है,व कविता, ग़ज़ल,हाइकु,वर्ण पिरामिड,लघुकथा, आलेख रचती हैं। प्रकाशन के तहत ३ साँझा काव्य संग्रह,हाइकु संग्रह एवं लघुकथा संग्रह आ चुके हैं। पाखी की रचनाएं विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं झारखंड से इंदौर तक छपी हैं। आपको-शीर्षक सुमन,बाबू मुकुंदलाल गुप्त सम्मान,माओत्से की सुगंध आदि सम्मान मिले हैं। मनोरमा जैन की लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा के माध्यम से मन के भाव को शब्द देना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-हिंदी में पढ़े साहित्यकारों की लेखनी,हिंदी के प्राध्यापक डॉ. श्याम सनेही लाल शर्मा और उनकी रचनाएं हैं। मन के भाव को गद्य-पद्य में लिखना ही आपकी विशेषज्ञता है।

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2 Comments

  1. वाहहहहहह दीदु जी, खूबसूरत लिखा है, वाकई बहुत सुंदर लिखते हो आप👏👏👏

  2. आदरणीय पाखी जी
    आपकी लेखनी विषय वस्तु का इतना सजीव वर्णन करती है कि लगता है कि सारा द्रश्य किसी चल चित्र की भांति आंखों के सामने घूमने लगता है
    आप निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर हो यही कामना करते हैं.. कोटि कोटि शुभकामनाएं
    रणधीर सिंह एडवोकेट भिण्ड

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