साँझ

सौदामिनी खरे दामिनी
रायसेन(मध्यप्रदेश)

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सुहानी भोर ने मुस्कान देकर उठाया,
चढ़ गया दिन।
तपती दुपहरी ने जी भर जलाया,
कब हो गयी जिन्दगी की साँझ…
कुछ समझ ही न पाया।

भोर की मुस्कान लेकर,
दुपहरी की धूप में चलता रहा। मंजिलों की ओर मैं…
अब साँझ की इस धुन्ध में कुछ नजर ही न आया।

छूट गयी कुछ कीमती यादें,
रह दस्तूर कुछ,
दिनभर की इस आपा-धापी में,
करने थे जो जरूरी काम मेरे…
कर ना पाया और साँझ हो गयी।

अब दिन के उजाले दूर हैं,
तपती दुपहरी के छाले भरपूर हैं
बेजार तन है,
उससे भी बेजार-सा मन है…
अब साँझ हो गयी।

पल-पल वक्त गुजरता गया,
मैं उसे और वो मुझे काटता रहा
अपनी जीत पर हम दोनों ही खुश थे,
जिन्दगी में साँझ हो गयी।

घाट-घाट और बाट-बाट पर,
पाठ अनेक पढ़ लिए
सबक याद करते रहे और,
जिन्दगी की साँझ हो गयी।

मंदिरों के घण्टों की धुन में नाचे मन मेला है,
आरती अभी बाकी है और,
साँझ हो गयी।

काली रात आयेगी या सुहानी चाँदनी, चिर निद्रा में सुलायेगी…
मिलेगी परम शान्ति,
जिन्दगी की साँझ हो गयी॥

परिचय-सौदामिनी खरे का साहित्यिक उपनाम-दामिनी हैl जन्म-२५ अगस्त १९६३ में रायसेन में हुआ हैl वर्तमान में जिला रायसेन(मप्र)में निवासरत सौदामिनी खरे ने स्नातक और डी.एड. की शिक्षा हासिल की हैl व्यवसाय-कार्यक्षेत्र में शासकीय शिक्षक(सहायक अध्यापक) हैंl आपकी लेखन विधा-गीत,दोहा, ग़ज़ल,सवैया और कहानी है। ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय दामिनी की लेखनी का उद्देश्य-लेखन कार्य में नाम कमाना है।इनके लिए प्रेरणापुन्ज-श्री प्रभुदयाल खरे(गज्जे भैया,कवि और मामाजी)हैंl भाषा ज्ञान-हिन्दी का है,तो रुचि-संगीत में है।

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