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चाँद को जलाते हो

सलिल सरोज
नौलागढ़ (बिहार)

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शाम ढले तुम छत पे क्यूँ आते हो,
मुझे मालूम है चाँद को जलाते हो।

तुमसे ही नहीं रौशन ये जहाँ सारा,
मुस्कुराकर तुम उसे यह बताते हो।

होंगे सितारे तुम्हारे हुस्न पर लट्टू,
गिरा के दुपट्टा ये गुमाँ भी भुलाते हो।

हुई पुरानी तुम्हारी अदाओं की तारीफें,
रोककर सबकी साँसें उसे जताते हो।

अमावस का डर भी तो है उसे पल-पल,
तुम बेधड़क जलवा रोज़ दिखाते हो।

कर दे वो रातें सबकी काली,कोई फर्क नहीं,
खिलखिला के तुम दो जहाँ जगमगाते हो॥

परिचय-सलिल सरोज का जन्म ३ मार्च १९८७ को बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)हुआ है। आपकी आरंभिक शिक्षा कोडरमा (झारखंड) से हुई है,जबकि बिहार से अंग्रेजी में बी.ए तथा नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए सहित समाजशास्त्र में एम.ए.भी किया है। एक निर्देशिका का सह-अनुवादन,एक का सह-सम्पादन,स्थानीय पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन किया है। सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र ही आपकी सम्प्रति है। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिशकरते हैं। ३० से अधिक पत्रिकाओं व अखबारों में इनकी रचनाओं का निरंतर प्रकाशनहो चुका है। भोपाल स्थित फॉउंडेशन द्वारा अखिल भारतीय काव्य लेखन में गुलज़ार द्वारा चयनित प्रथम २० में आपको स्थान मिला है। कार्यालय की वार्षिक हिंदी पत्रिका में भी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।