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धर्म बन गया राजनीति की चेरी

कमलेश वर्मा ‘कोमल’
अलवर (राजस्थान)
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विश्वास: मानवता, धर्म और राजनीति…

जब से धर्म के बीच में, राजनीति का आना शुरू हुआ
तब से राजनीति का काम ही, धर्म के नाम पर हुआ।

यह कैसी विडम्बना है,
धर्म-कर्म के नाम की,
राजनीति का नाम धर्म से, पहले जुड़ गया।

धर्म के नाम पर आस्था,
अब हो गई है कम
बस दिखावा रह गया
यह भी न जाने हम।

आस्था-विश्वास न रहा,
बस दिखावा रह गया
आज का मानव देख लो, कितना खुदगर्ज हो गया।

धर्म-कर्म के नाम पर, राजनीति ही फैली रही
मन में एक-दूसरे के प्रति
बस नफरत ही घुल रही।

अब धर्म के नाम पर बस, राजनीति ही हो रही
मंदिर-मस्जिद की पूजा भी, बस राजनीति की भेंट चढ़ गई।

क्यूँ मौन होकर देख रहा,
हे! जगत विधाता
शर्म न आती हर जन को,
तू क्यों न सबक सिखाता ?

चुपचाप होता देख रहा, आस्था का कोहराम
नहीं मिटेगा जब तलक है, राजनीति ऐसे बहाल।

साधु-संत भी राजनीति में,
हो गए अब शामिल
क्यों पूजा कर रहे नेताओं की, ये कैसी है उनकी मंजिल ?

धर्म-कर्म के नाम पर साधु,
संत भी कर रहे राजनीति
ज्ञान मार्ग को छोड़ कर क्यों, कर रहे हैं ऐसी रणनीति।

जब से धर्म के बीच में, राजनीति का आना शुरू हुआ
तब से ही लोगों के दिलों में, विश्वास दूर हुआ।

धर्म बस दिखावा है यही, राजनीति का पहनावा है।
हाल यह है कि धर्म बनकर, रह गया राजनीति की चेरी॥

परिचय –कमलेश वर्मा लेखन जगत में उपनाम ‘कोमल’ से पहचान रखती हैं। ७ जुलाई १९८१ को दुनिया में आई रामगढ़ (अलवर) वासी कोमल का वर्तमान और स्थाई बसेरा जिला अलवर (राजस्थान) में ही है। आपको हिन्दी, संस्कृत व अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है। एम.ए. व बी.एड. तक शिक्षित कमलेश वर्मा ‘कोमल’ का कार्यक्षेत्र व्याख्याता (निजी संस्था) का है। इनकी लेखन विधा-गीत व कविता है। इनकी रचनाएं पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं तो ब्लॉग पर भी लेखन जारी है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-“कविता के माध्यम से विचार प्रकट करना एवं लोगों को जागरूक करना है।” पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, एवं जय शंकर प्रसाद हैं तो विशेषज्ञता- पद्य में है। बात की जाए जीवन लक्ष्य की तो भारतीय समाज में सम्मान प्राप्त करना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार -“राष्ट्र एक व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास राष्ट्र पर निर्भर करता है। हिंदी हमारी राष्ट्र और मातृत्व भाषा है, जो सरल तरीके से समझी और बोली भी जा सकती है। इसलिए इसे बढ़ाया ही जाना चाहिए।”