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पीएफआई:प्रतिबंध से कट्टरवादी सोच पर अंकुश

ललित गर्ग
दिल्ली
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कथित रूप से आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता एवं आईएसआईएस जैसे भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों से निकट संबंधों के चलते पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और उसके ८ सहयोगी संगठनों पर केन्द्र सरकार ने ५ साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है। राष्ट्रीय एकता एवं आपसी सौहार्द-सद्भावना को क्षत-विक्षत करने वाले इन संगठनों पर यह कार्रवाई बहुत पहले हो जानी चाहिए थी, लेकिन अब भी यह कार्रवाई होना सराहनीय कदम है। केंद्र सरकार ने यह कदम एनआइए की प्रारंभिक जांच के बाद उठाया है। प्रतिबंध से पहले एनआइए ने देशभर में इस संगठन के दफ्तरों पर छापे मारे। इनके कार्यालय से हथियार, विदेशी मुद्रा, मानव शूटिंग लक्ष्य के पुतले, बम, महंगा कच्चा माल, गन पाउडर और तलवारें मिलीं। इन संगठनों पर आतंकी संगठनों से संबंध रखने, हथियार रखने व इन्हें चलाने का प्रशिक्षण देने, अपहरण, हत्या, घृणा अभियान चलाने, दंगे भड़काने समेत कई गंभीर आरोप लगे। इन पर आतंकी जोड़ और देश विरोधी गतिविधियां चलाने के आरोप हैं। सरकार ने माना है कि इन संगठनों की गतिविधियां देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं। ये संगठन भारत विरोधी हैं और इनका भारत में प्रतिबंधित होना जरूरी है।
भारत के विखण्डन की भावना से वर्ष २००६ में बना यह संगठन इस समय २३ राज्यों में सक्रिय है। लगातार इसका प्रभाव बढ़ रहा था। पीएफआइ जैसे संगठनों के बैनर तले लोग कट्टरवाद के खिलाफ बोलने वालों को भी लगातार निशाना बना रहे हैं, शांति-व्यवस्था भंग कर रहे थे एवं भारत में पाकिस्तानी के इरादों को अंजाम दे रहे थे। दरअसल, यह कार्रवाई ऐसे वक्त हुई है, जब पूरी दुनिया में कट्टरवाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है। अमरीका से लेकर यूरोपीय देशों में भी इस्लामी कट्टरवाद मुद्दा बना हुआ है और ऐसे संगठनों को पूरी दुनिया के लिए खतरा माना जा रहा है। इन बड़े खतरों से सुरक्षा करना भारत सरकार की प्राथमिकता होना ही चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार अब देश की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले हर संगठन के खिलाफ पूरी ताकत से खड़ी होगी। प्रतिबंध के साथ ही सरकार को ऐसे संगठनों की जड़ को तलाश कर उस पर प्रहार करना होगा। साथ ही इन संगठनों की विदेशी राशि के तमाम रास्तों को भी बंद करना होगा। ऐसा होने पर आतंक के पर्याय बन रहे संगठनों और उनसे जुड़े लोगों की कमर टूट जाएगी और इस कार्रवाई से देश में शांति एवं अमन का वातावरण बन सकेगा। घृणा, नफरत एवं खून की इस विरासत को खंडित करना राष्ट्रीय एकता के लिए नितान्त अपेक्षित हो गया था।
भारत के लोकतन्त्र में हिंसा के बूते पर धार्मिक उग्रवाद फैला कर किसी विशेष सम्प्रदाय को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों व आतंकवाद की तरफ धकेलने वाले इस संगठन के वजूद को केवल अहिंसा एवं सौहार्द को ही साध्य मानने वाले इस राष्ट्र में सहन नहीं किया जा सकता। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को बल देने वाले इस देश में कट्टरवाद एवं उन्मादी सोच को कैसे पनपने दिया जा सकता है ? इस पीएफआइ के कार्यकर्ताओं ने अनेक खूनी खेल खेले हैं। देश के अन्य भागों में भी ऐसी ही आतंकवादी, उन्मादी एवं हिंसक घटनाओं को अंजाम देने वाला यह संगठन हर दिन किसी बड़ी आतंकी घटना के लिए तत्पर रहता आया है। मुस्लिम समुदाय की सहानुभूति जुटाने एवं उनके हितों की बात करने वाला यह संगठन उन्हीं लोगों के लिए कितना खतरनाक साबित हुआ है, यह बात मुस्लिम समुदाय को समझने की जरूरत है। भारत में मुस्लिम समाज अपनी मूलभूत समस्याओं को लेकर सबसे अधिक परेशान है। शिक्षा, रोजगार और शांति इस समुदाय की प्राथमिकताओं में है। अपराध और नशे से मुक्ति, महिला अधिकारों की सुरक्षा, बच्चों को बेहतर तालीम और बेहतर जीवनस्तर भारत के मुसलमानों की घोर आवश्यकता है, पर नशा सिर्फ रसायनों और तम्बाकू से ही नहीं होता। विचार का भी एक नशा होता है जो पीएफआई ने भारत के मुस्लिम युवाओं को पिलाने की कोशिश की। जिसने हाथ में बम उठा लिया हो, वह कोई तर्क नहीं सुनेगा। हर कोई मुस्लिम कट्टर हो गया। सभी कुछ बंट रहा है, टूट रहा है। बंटने और टूटने की जो प्रतिक्रिया हो रही है, उसने राष्ट्र को हिला दिया है, लेकिन भारत के सांस्कृतिक परिवेश में पीएफआई जैसे संगठन सफल तो नहीं हो पाएंगे, अलबत्ता पहले से परेशान मुस्लिम समुदाय को और परेशान जरूर करेंगेे। जिन करोड़ों लोगों को अशिक्षा, भुखमरी, नशा और अमानवीयता से लड़ना है, उन्हें अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए अगर पीएफआई की तरफ देखना पड़े, तो यह निश्चित ही समाज की वैचारिक हार है।
‘गजवा-ए- हिन्द’ का अगर एक भी पैरोकार आज के भारत में आजाद और खुला घूमता है तो वह पूरे मुल्क की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती की तरह ही देखा जाएगा क्योंकि उसका केवल दिलो-दिमाग ही नहीं, बल्कि पूरा जिस्म मजहब की बुनियाद पर इंसानियत के कत्ल की पैरवी करता है। भारत यह नजारा १९४७ में देख चुका है।
आजादी के ७५ साल बाद भी अगर उसी जिन्ना की जहरीले ख्वाबों को हवा देने का काम पीएफआई जैसे कट्टरवादी संगठन करते हैं और मजहब के आधार पर भारतीयों को हिन्दू-मुसलमान में बांट कर इंसानियत को आहत करते हैं तो जितनी तरक्की भारत ने पिछले ७५ सालों में की है, उस पर गर्द डालने की साजिश को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने की शक्ति एवं अधिकार सरकार को इस देश का संविधान ही देता है। इसलिए प्रतिबन्ध लगाने का समर्थन आगे बढ़ कर सबसे पहले देश की मुस्लिम युवा पीढ़ी को ही करना चाहिए, क्योंकि यह मुस्लिम युवा पीढ़ी को मजहब के नाम पर संगठित करके उन्हें आतंकवादी बनाने का काम पीएफआई करती थी।
विडम्बना देखिए कि सरकार की इस कार्रवाई पर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। ऐसे मामलों में राजनीति ठीक नहीं है। इस वक्त सबसे जरूरी बात यह है कि सरकार देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे संगठनों और लोगों पर सख्ती दिखाए। बड़ी चुनौती यह भी है कि जिन संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया है, वे किसी नए संगठन से न जुड़ जाएं। पिछला अनुभव भी ऐसा ही है। ऐसे संगठन प्रतिबंध के बाद नई शक्ल लेकर वापस आते रहे हैं। पीएफआई का उदाहरण सबके सामने है, जो ‘सिमी’ पर प्रतिबंध के बाद जन्मा। जाहिर है, सरकार को आगे और ज्यादा सतर्कता से कदम बढ़ाने होंगे।

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