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मेरा विद्यार्थी जीवन और रचना धर्मिता

डॉ.धारा बल्लभ पाण्डेय’आलोक’
अल्मोड़ा(उत्तराखंड)

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मेरा विद्यार्थी जीवन स्पर्धा विशेष ……..

पिताजी यद्यपि अपने समय के कक्षा ४ उत्तीर्ण थे,फिर भी उनकी गणित बहुत अच्छा था।
विद्यालय घर से दूर होने के कारण मेरी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। कक्षा ३ से प्राथमिक विद्यालय हऊली (चौनलिया) में प्रवेश लिया। गुरुजी श्री भैरवदत्त एवं श्री दयाकृष्ण जोशी ने विद्यालय में मेरा प्रवेश किया। मैं बहुत सीधा व सरल स्वभाव का था। इस सीधेपन के कारण अगल-बगल बैठे शरारती बच्चे मेरी लापरवाही का फायदा उठाकर रोज कुछ न कुछ सामान चुरा लेते थे। शाम को पिताजी बस्ता खोलकर देखते तो बस्ते से बहुत सारा सामान गायब रहता था। विद्यालय में इस तरह के बच्चों के ज्यादा होने से मेरा मन वहाँ अधिक नहीं लगा और घर के नजदीक नया विद्यालय खुलने पर कक्षा ४ की अर्द्धवार्षिक परीक्षा के बाद प्राथमिक विद्यालय डुमना में प्रवेश ले लिया। विद्यालय का भवन नहीं था। एक बड़े आम के पेड़ के नीचे बैठकर कक्षाएं चलती थी। विद्यालय में दूसरे वर्ष में गुरुजी शेर सिंह रावत जी आए थे। उनका छुट्टी के बाद शाम को गाँव में घूमने का मुझ पर इतना प्रभाव पड़ा कि मैं अपना काम समय पर ही कर लेता था। धीरे-धीरे अपना काम समय से करना और खाली समय बर्बाद न करना मेरी प्रवृत्ति बन गई थी।
कक्षा ६ में मैंने उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चौनलिया में प्रवेश लिया। मैं पूरे विद्यालय में उम्र में भी व कद में भी सबसे छोटा था। बड़ी कक्षाओं के बड़े भाई,विद्यालय के गुरुजन व प्रधानाचार्यजी भी मुझे बहुत अच्छा मानते थे। यद्यपि मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं था किंतु कमजोर भी नहीं था। मेरा सरल स्वभाव व आज्ञाकारिता का गुण देखकर सब प्रसन्न रहते थे। प्रधानाचार्य मोहनसिंह रावत जी मुझे ‘धारीवाल’ कहकर हर कार्यक्रम में मुझे मंगलाचरण करने के लिए आगे बुलाते थे।
इस अवधि में मेरे परिवार को बहुत दुःख सहने पड़े। तब मैं कक्षा ७ में ही पढ़ता था। घर की आर्थिक स्थिति व विषम परिस्थितियों के कारण पिताजी का विचार कक्षा ८ उत्तीर्ण करने के पश्चात संस्कृत विद्यालय काशीपुर में पढ़ने के लिए भेजने का हुआ,परंतु तात्कालिक प्रधानाचार्य श्री रावत ने काफी समझा-बुझाकर पिता जी को प्रमाण-पत्र देने से मना कर दिया। अतः चौनलिया से ही १४ वर्ष की उम्र में हाईस्कूल उत्तीर्ण किया,परंतु आगे की पढ़ाई फिर बाधित हो गई।
मुझे बचपन से ही लिखने-पढ़ने का काफी शौक था। विद्यार्थी जीवन में कविता सुनाना,विभिन्न आयोजनों पर लिखकर भाषण देना,सामूहिक रूप से सांस्कृतिक महोत्सवों में उत्साहपूर्वक रुचि लेना अच्छा लगता था। मेरे स्वभाव में शालीनता होने व अपनी कक्षा में सबसे कम उम्र का होने से गुरुजन और बड़ी कक्षाओं के लड़के मुझे बहुत प्यार करते थे और हमेशा यह अपेक्षा रखते थे कि मैं हर आयोजन में भाग लूँ। यही मरी रचनाधर्मिता की बुनियाद थी।
१५वें वर्ष की उम्र में जब पिताजी द्वारा आर्थिक परेशानी के कारण आगे पढ़ाने से मना कर दिया था,तो घर पर ही रह कर गायों को चराने जंगल जाया करता था। एकांत में बैठकर कुछ न कुछ करते रहने,पुस्तकें पढ़ने या पत्थर का टुकड़ा हाथ में लेकर बड़े पत्थर पर रेखाएं खींचकर रेखागणित की प्रमेयों और निर्मेयों को हल करते रहना मेरी प्रवृत्ति बन चुकी थी। उसी बीच संस्कृत में सबसे पहली रचना ‘संतोषी माता व्रत कथा’ लिखी थी।
उसी समय हाईस्कूल में निजी तौर पर इंटर की ट्यूशन कक्षा चलाई जा रही थी। एक दिन बाजार से राशन लेकर आ रहा था। ज्यों ही दुकान पर गया तो वहाँ प्रधानाचार्य रावत जी बैठे हुए थे। मुझे देखते ही बोले,-‘क्यों रे धारीवाल तू पढ़ने क्यों नहीं आ रहा है ?’
मैंने पिताजी के मना करने की बात बताई तो बोले,-‘खाना तो तू खाता ही होगा,कपडे़ तू पहनता ही होगा, फिर परेशानी क्या है ?’
मैंने खर्चे की समस्या बताई तो बोले,किताबें तुझे विद्यालय से दे देंगे, फीस आधी माफ कर देंगे और कापी खरीदने के लिए मेरे से पैसे ले जाना,पर कल से विद्यालय जरूर आना। यह सुनकर मेरे अंदर का उत्साह जाग गया।
घर आकर माँ को यह सब बात बताई और पिताजी को तुरंत पत्र में सारी बात का जिक्र करके विद्यालय जाने की बात लिखकर २०० रुपए भेजने को लिखा। मेरी जिद देखकर पिताजी भी सहमत हो गए। मैंने गणित विषय के स्थान पर भूगोल लेकर प्रवेश ले लिया। अक्टूबर माह में विचार बदला। फिर भूगोल की जगह पर अंग्रेजी ले ली। अंग्रेजी के नाम पर मैं केवल वर्णमाला जानता था,क्योंकि तब अंग्रेजी कक्षा ६ से प्रारंभ होती थी,और हाईस्कूल में मैंने अंग्रेजी के बजाय संस्कृत विषय पढ़ा था। अंग्रेजी पढ़ाने वाले गुरुजी मदनराम आर्य जी को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने सख्त चेतावनी दी कि,-‘मेरी क्लास में बैठना होगा तो खूब मेहनत करनी पड़ेगी। ऐसे काम नहीं चलेगा।’ मैने खूब मेहनत की और परीक्षा उत्तीर्ण की। इसमें मेरे बड़े भाई ख्यालीराम पांडेय,निःशुल्क पढ़ाने के लिए प्रधानाचार्य रावत जी व आर्य जी का मार्ग-निर्देशन अविस्मरणीय है।
तत्पश्चात बी.टी.सी. प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद १९७६ में बी.ए. प्रथम वर्ष का आवेदन भरने की कहानी विचित्र है। आगे पढ़ाई की ललक होने व पिताजी द्वारा पढ़ाने की असमर्थता के कारण गाँव के तारादत्त हर्बोला से १०० रु. कर्ज माँगा और नौकरी लगने के बाद ही लौटाने का वायदा किया। रानीखेत से फार्म मँगवाया। किसी को जरा-सा भी पता नहीं चलने दिया। सुबह जल्दी उठकर रानीखेत जाने की तैयारी करते हुए पिताजी से ५० रु. माँगे, तो कारण पूछा। मैंने उन्हें पूरी बात बताई। पिताजी ने पैसे देते हुए कहा,-‘फार्म अब भर ही दिया है तो जा।’ लेकिन इस बात से उनके मन में यह संतोष था कि मुझमें पढ़ने व आगे बढ़ने की ललक है। पिताजी कठोर जरूर थे किंतु मेरी भावनाओं व मेहनत से द्रवित हो जाते थे।
बेरोजगारी,बेसहारा,स्वावलंबित व आर्थिक परेशानी से भरे जीवन से जूझते हुए हम दोनों ने धीरे-धीरे अपना घर परिवार सँभाला। सेवा के साथ-साथ विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा,नेट परीक्षा आदि की तैयारी के रूप में शिक्षा व रचना धर्मिता का कार्य सतत चलता रहा।
विद्वज्जनों से प्रभावित होकर समय-समय पर कई रचना लिखी,कई निबंध भी लिखे जिनमें से कुछ निबंधों को संकलित कर ‘ज्योति निबंधमाला’ व ‘अभिनव चिंतन’ पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा चुका है।
इस प्रकार मेरा विद्यार्थी जीवन माँ सरस्वती जी की कृपा तथा माता-पिता व गुरुजनों के वरदहस्त से अपनी शैक्षिक प्रगति व रचना धर्मिता के साथ-साथ आगे बढ़ता रहा और आशातीत सफलता प्राप्त होती रही।

परिचय-डॉ.धाराबल्लभ पांडेय का साहित्यिक उपनाम-आलोक है। १५ फरवरी १९५८ को जिला अल्मोड़ा के ग्राम करगीना में आप जन्में हैं। वर्तमान में मकड़ी(अल्मोड़ा, उत्तराखंड) आपका बसेरा है। हिंदी एवं संस्कृत सहित सामान्य ज्ञान पंजाबी और उर्दू भाषा का भी रखने वाले डॉ.पांडेय की शिक्षा- स्नातकोत्तर(हिंदी एवं संस्कृत) तथा पीएचडी (संस्कृत)है। कार्यक्षेत्र-अध्यापन (सरकारी सेवा)है। सामाजिक गतिविधि में आप विभिन्न राष्ट्रीय एवं सामाजिक कार्यों में सक्रियता से बराबर सहयोग करते हैं। लेखन विधा-गीत, लेख,निबंध,उपन्यास,कहानी एवं कविता है। प्रकाशन में आपके नाम-पावन राखी,ज्योति निबंधमाला,सुमधुर गीत मंजरी,बाल गीत माधुरी,विनसर चालीसा,अंत्याक्षरी दिग्दर्शन और अभिनव चिंतन सहित बांग्ला व शक संवत् का संयुक्त कैलेंडर है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बहुत से लेख और निबंध सहित आपकी विविध रचनाएं प्रकाशित हैं,तो आकाशवाणी अल्मोड़ा से भी विभिन्न व्याख्यान एवं काव्य पाठ प्रसारित हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न पुरस्कार व सम्मान,दक्षता पुरस्कार,राधाकृष्णन पुरस्कार,राज्य उत्कृष्ट शिक्षक पुरस्कार और प्रतिभा सम्मान आपने हासिल किया है। ब्लॉग पर भी अपनी बात लिखते हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-हिंदी साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न सम्मान एवं प्रशस्ति-पत्र है। ‘आलोक’ की लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा विकास एवं सामाजिक व्यवस्थाओं पर समीक्षात्मक अभिव्यक्ति करना है। पसंदीदा हिंदी लेखक-सुमित्रानंदन पंत,महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’,कबीर दास आदि हैं। प्रेरणापुंज-माता-पिता,गुरुदेव एवं संपर्क में आए विभिन्न महापुरुष हैं। विशेषज्ञता-हिंदी लेखन, देशप्रेम के लयात्मक गीत है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का विकास ही हमारे देश का गौरव है,जो हिंदी भाषा के विकास से ही संभव है।”

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