पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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सुशील ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, तभी मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर माँ का फोटो उभरा था। माँ को तो कोई काम नहीं है, वक्त बेवक्त फोन खटखटा देती हैं। काफी देर तक घंटी बजती रही, लेकिन वह आराम से तैयार होता रहा। वह जानता था, कि उनके पास एक बात ही होगी, कि बेटा पापा की तबियत खराब है। वह तुम्हें बहुत याद करते हैं। वह नहीं समझते…। जब वह गाड़ी में बैठ गया, तब उसने माँ को फोन किया “माँ यह तो देखा करो, कि मेरा ऑफिस का टाइम है। बस फोन मिला देती हो। कौन-सी आफत टूट पड़ी है ?अब बोलती क्यों नहीं, अब चुप हो गई हो। मुझे बेवजह परेशान करती रहती हो। ऑफिस की इतनी जरूरी मीटिंग है और सुबह-सुबह मूड खराब करके रख दिया।”
माँ सरला की आँखों से आँसू बह निकले थे, “पापा की तबियत ज्यादा खराब है। वह तुम्हें बहुत ज्यादा याद कर रहे हैं। एक बार लल्ला को जी भर कर देख लें, कहते रहते हैं…”
तबियत ज्यादा खराब है, तो मैं कोई डॉक्टर थोड़े ही हूँ, डॉक्टर को बुला कर दिखा लो। पैसे की जरूरत हो तो बताओ। “
“नहीं” कह कर माँ ने फोन देखा, तो बेटा तो पहले ही फोन काट चुका था।
वह पति की बेबस निगाहों को देख कर बोलीं, “इसने कहा है कि वह जल्दी ही आएगा।”
पिता की आँखें बेटे के आने की उम्मीद से चमक उठीं थीं। वह बेहोशी की हालत में रह-रह कर बेटे का नाम पुकारते रहते… २ दिन बाद वह बेटे की आस लगाए हुए इस दुनिया से विदा हो गए।
पड़ोसी तुरंत इकठ्ठा हो गए। सरला जी ने बेटे को पिता के स्वर्गवास की खबर नहीं दी, लेकिन किसी पड़ोसी ने उसे खबर कर दी तो बेटा पत्नी और बच्चे के साथ रोता हुआ आ गया।
अंतिम यात्रा शुरू हो गई तो माँ को साथ में चलते देख बेटा बोला, “माँ तुम क्यों चल रही हो…?
“बेटा, क्रिया करने के बाद १२ दिनों तक घर पर बैठना पड़ेगा… तुम्हारे काम का नुकसान होगा… तुम्हारे पास समय कहाँ है…?