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सांत्वना बेकार

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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सृष्टि चक्र की ओ शाश्वत शिल्पीनी,
नारी-नर की सुदृढ़ सबल आधार
मिले तो जीते जी प्रेम मिले तुझको,
मर कर समाज की सांत्वना बेकार।

चील-कौवों सी नोंच-नोंच कर,
बेइज्जत करे नर तुझे भरे बाजार
वासनिक नर्तन नए नित करता जो,
जाने क्यों कहता है उसको ही प्यार ?

तू शाश्वत अंश है प्रेम धाम की,
है सृष्टि क्रम का तू मुख्य द्वार
न जाने क्यों समझ बैठा है नर,
तुझ पर अपना एकाधिकार ?

आपराधिक घटनाओं से तार-तार कर,
तेरे स्नेहिल जीवन अस्तित्व का भंडार
मर्जी में न ढली गर नर नृशंसता की तो,
कर डालते हैं क्यों मूढ़ता में बलात्कार ?

युगों-युगों से सिर्फ तू ही क्यों,
होती आई है नराधमता की शिकार ?
हो राजाओं का शासन रहा चाहे,
या हो फिर चाहे लोकतंत्र की सरकार।

अनन्त आनंद की सृष्टि ओ ममता!
कब समझेगा तेरे उद्गार संसार ?
है हवस की रोटी नर श्वान की क्या तू ?
कब मिलेगा तुझको पूर्ण अधिकार ?

तू लूटी गई तू छली गई ओ कोमलांगी!
समझा कुटिल नरों ने यह निज अधिकार
निश्छल सौंदर्य देख तू अपने जीवन का,
फिर भी करती रही तू नित नर से ही प्यार।

मिले तो जीते जी मिले न्याय तुझको,
बने न किसी की तू हवस की शिकार
अस्मत लूटने के बाद तो हो हल्ला,
और है सबकी सब सांत्वना बेकार।

नर-नारी के सजीव युग्म को कुदरत ने,
बनाया है अपने कलेवर का प्रबल श्रृंगार
फिर भी न जाने क्यों नर अंधा-सा होकर,
करता है तुझसे मनमाना विकृत व्यवहार ?

मर्दित मानस में मर्द के करता है मर्म जब,
तेरे मृदुल गात का चिरंतन सुकोमल श्रृंगार।
जख्म भरते हैं पुरुष चेतन मन के तब,
पल्वित उद्भासित होता है तब नूतन संसार॥