वो जीवन था बड़ा सलोना
आशीष प्रेम ‘शंकर’मधुबनी(बिहार)********************************************************************** वो जीवन था बड़ा सलोना,गुड़िया रानी खेल-खिलौनाजीवन चक्र बड़ा ही निर्मम,करते थे जब सब मनमाना। कभी रूठना,फिर उठ जाना,वैदेही-सा जीवन झरनाजिसे न थी चिंता एक पल भी,अब चिंता ही जीना-मरना। माँ के हाथ से भोजन खाना,पिता के कंधों पर इठलानामन था निर्मल गंगा जैसा,भेदभाव मुक्त था आना-जाना। बड़े-बड़े पैसे वाले थे पर,समझ … Read more