सार्वजनिक कार्यक्रम में ‘डीजे’ मतलब मौत को निमंत्रण

डॉ.अरविन्द जैनभोपाल(मध्यप्रदेश)******************************************* चिंतन… हमारे देश में ७ वार और ९ त्यौहार मनाए जाते हैं तथा देश स्वतंत्र होने से स्वच्छंदता से भरपूर है। धर्म के नाम पर इतने कट्टर हैं कि, धर्मस्थल के सामने आवाज़ बंद हो जाती है, पर जीवित इंसानों की कोई कीमत नहीं है। ऐसे ही मरणोपरांत सम्मान और इज़्ज़त मिलती है, … Read more

अंधी दुनिया में गुम होती किशोर पीढ़ी

ललित गर्गदिल्ली************************************** संचार-क्रांति से दुनिया तो सिमटती जा रही, लेकिन रिश्तों में फासले बढ़ते जा रहे हैं। भौतिक परिवर्तनों, प्रगति के आधुनिक संसाधनों एवं तथाकथित नए जीवन का क्रांतिकारी दौर हावी है, लेकिन हम सामाजिक-पारिवारिक-सांस्कृतिक प्रभावों के प्रति उतने सजग नहीं हैं, जितना बदलावों की आंधी के दौर में होना चाहिए। मोबाइल ने छीन रखा … Read more

राष्ट्रगान ही राष्ट्र की पहचान व सम्मान

डॉ.अरविन्द जैनभोपाल(मध्यप्रदेश)******************************************* हमारे देश और अभी कुछ दिनों पूर्व किसी अन्य देश में राष्ट्रध्वज का अपमान किया गया, उसको पैरों से कुचला और अपने देश के निवासियों ने ही अपमान किया तथा उस पर ख़ुशी मनाई, जो हम देशवासियों के लिए लज़्ज़ा की बात हुई। राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के लिए लाखों लोगों ने अपना बलिदान … Read more

वेश-भूषा

दिनेश चन्द्र प्रसाद ‘दीनेश’कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)******************************************* बढ़ी हुई दाढ़ी, मैले-कुचैले एवं फटे कपड़े, टूटी चप्पल पहने एक व्यक्ति शहर की सबसे बड़ी पाँच सितारा होटल में घुसने की कोशिश कर रहा था। गेट पर खड़े दरबान उसे डाँटकर भगा रहे थे, अंदर घुसने नहीं दे रहे थे। लाख कोशिश के बावजूद वह होटल न जा … Read more

अमेरिकी छवि को दागदार करती बन्दूक ‘संस्कृति’

ललित गर्गदिल्ली************************************** दुनिया में स्वयं को सभ्य एवं स्वयं-भू मानने वाले अमरीका में ‘बंदूक संस्कृति’ के साथ लोगों में बढ़ रही असहिष्णुता, हिंसक मनोवृत्ति और आसानी से हथियारों की सहज उपलब्धता का दुष्परिणाम बार-बार होने वाली दुखद घटनाओं के रूप में सामने आना चिन्ताजनक है। अमेरिका में १ हत्यारे ने गोलियाँ बरसाकर करीब २१ लोगों … Read more

दिखावे की प्रतिस्पर्धा से भक्ति घटी

रत्ना बापुलीलखनऊ (उत्तरप्रदेश)***************************************** शक्ति, भक्ति और दिखावा… भक्ति, शक्ति और दिखावा ये तीनों शब्द एक-दूसरे के पूरक होते हुए भी अर्थ एंव साम्यर्थ में भिन्न हैं। हिन्दुओं का हर त्यौहार भक्ति-भावना की ज्योति जलाकर ही आता है, पर आजकल इस भक्ति-भावना में आडम्बर एवं दिखावे का इतना बाहुल्य है कि, भक्ति-भावना तिरोहित हो गई है।यह … Read more

दंत विहीन संघ संयुक्त राष्ट्र

डॉ.अरविन्द जैनभोपाल(मध्यप्रदेश)******************************************* संयुक्त राष्ट्र संघ का महत्व वर्तमान में उतना प्रभावशाली नहीं है। वह बिना दांत का शेर है, क्योंकि संघ में विकसित देशों की पकड़ है। पिछले वर्ष रूस और यूक्रेन युद्ध में संयुक्त राष्ट्र ने कोई भी महती भूमिका नहीं निभाई। वर्तमान में इज़राइल और हमास के युद्ध में संयुक्त राष्ट्र मूक दर्शक … Read more

दुनिया में आपका कौन ?

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’सोलन(हिमाचल प्रदेश)***************************************************** इस दुनिया में आपका अपना कौन है ?, यह सवाल अजीब लग रहा होगा। सभी लोग कहेंगे कि, मेरे माँ-बाप हैं, भाई-बहिन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं, अपना परिवार है, रिश्तेदार हैं, सभी मेरे अपने हैं। यदि आप ऐसा सोचते हैं तो आपकी यह सोच सौ प्रतिशत गलत … Read more

लोकतंत्र के हित में है नौकरशाहों का चुनाव लड़ना ?

ललित गर्गदिल्ली************************************** ५ राज्यों के विधानसभा एवं अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले अनेक प्रशासनिक अधिकारी राजनीति में आने के लिए अपने पदों से इस्तीफा दे रहे हैं। इन प्रशासनिक अधिकारियों को नौकरशाही की तुलना में राजनीति इतनी लुभावनी क्यों लग रही है, क्यों राजनीति के प्रति इनमें आकर्षण बढ़ रहा है ? … Read more

धर्म का मर्म समझें

राधा गोयलनई दिल्ली****************************************** भक्ति, शक्ति और दिखावा… ‘आनंद लूट ले बंदे, तू प्रभु की बंदगी का,न जाने छूट जाए,कब साथ जिंदगी का।’आप सोच रहे होंगे कि, यह क्या ! लिखा हुआ है ‘धर्म का मर्म’ तो क्या धर्म का यही मर्म है कि, प्रभु की बंदगी करते रहो!प्रभु की बंदगी का मतलब यह नहीं है … Read more