तुझ जैसी इक माँ…

नताशा गिरी  ‘शिखा’  मुंबई(महाराष्ट्र) ********************************************************************* मातृ दिवस स्पर्धा विशेष………… माँ, मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ। हाँ माँ, मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ। माना, माना परिधान बदल दिया है,साड़ी की जगह अब जीन्स ने ली है, क्या परिधान मात्र से मेरा वजूद खतरों में बतलायेंगे। देखो, … Read more

मदर्स-डे

सुरेन्द्र सिंह राजपूत हमसफ़र देवास (मध्यप्रदेश) ******************************************************************************* मातृ दिवस स्पर्धा विशेष………… वाह रे नए युग देखे जो तेरे परिवर्तन, दिनों-दिन। तूने माता-पिता के लिए भी निर्धारित कर दिए दो दिन। मदर्स-डे,फ़ादर्स-डे, अरे माता-पिता तो वो चन्दन हैं। उनके लिये तो हर दिन, हर पल वन्दन है। उनकी सेवा में ही छिपा परमेश्वर का प्यार है। उनकी … Read more

माँ का किरदार…

मनोज कुमार सामरिया ‘मनु’ जयपुर(राजस्थान) *************************************** मातृ दिवस स्पर्धा विशेष………… जब उसने कभी माँ का किरदार निभाया होगा, साड़ी में चेहरे पर ममता का भाव तो आया होगाl एक संवेदनहीन बुत से वह कैसे दिल लगाएगी, यह ख्याल उसके मन में हजार बार आया भी होगा ? सोचती होगी क्या खूब करिश्मा है यह भी … Read more

माँ गरीब नहीं होती

डॉ.चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि’ रोहतक (हरियाणा) ******************************************************* मातृ दिवस स्पर्धा विशेष………… माँ की लोरी से बढ़कर दुनिया में गाना नहीं होता, नापे माँ के दिल की गहराई कोई पैमाना नहीं होताl जब आलीशान महलों में बेताबियां बढ़ जाती हैं, माँ की गोद-सा कोई जहां में आशियाना नहीं होताll कुरूप से कुरूप बच्चा माँ को खूबसूरत होता … Read more

स्त्री

प्रज्ञा गौतम ‘वर्तिका’ कोटा(राजस्थान) ********************************************* स्त्री… स्त्री-गर्भ से प्रस्फुटित वह अंकुर, जो पुष्पित-पल्लवित हो उठता है बिना सींचे भी, गमक उठता है घर-भर पोसती है वह आँचल की छांव तले पीढ़ियों को, बिना जमाए अपनी जड़ें किसी धरती पर। स्त्री… स्नेह की रेशमी डोर, रेशा-रेशा बिखर कर तिरती रहती है, जाने कितने रिश्तों में जाने … Read more

गंगा की दुर्दशा

दीपक शर्मा जौनपुर(उत्तर प्रदेश) ************************************************* हे हिमतरंगिणी भगवती गंगे निर्मल नवल तरंगें, मैंने देखा था तुम्हें निकलते हुए हिमालय की गोद से अति चंचल, मधुर शीतल, धँवल चाँदनी-सी सुंदर। भगीरथ के दुर्गम पथ पर लहराती चली जा रही थी, पर क्या पता था कि मंजिल तक पहुँचते-पहुँचते, तू इतनी शिथिल और मलिन हो जाएगी। हे … Read more

बाल विवाह अभिशाप

अनिता मंदिलवार  ‘सपना’ अंबिकापुर(छत्तीसगढ़) ************************************************** बाल विवाह है अपराध, लड़की के लिए अभिशाप। बोझ न समझो बेटी को, पढ़ने दो,आगे बढ़ने दो। कम उम्र में करनी शादी, उसके जीवन की बर्बादी। बाल विवाह कुप्रथा है, इसे नहीं अपनाओ तुम। होने दो विकास उसका, जीने की आजादी दो। न दो बिटिया को सजा, उसका जीवन सँवारो … Read more

वृतिका

कपिल कुमार जैन  भीलवाड़ा(राजस्थान) ***************************************************************** आज शाम को द्वार पे विदा कर के, ज्यों ही रात्रि के आरम्भ में मैं चांद के आगोश में समाया, थकान से बोझिल पलकों ने मुझे मेरी ‘वृतिका’ से मिलवाया, ख़्वाब में आई एक मूरत कुछ जानी कुछ अनजानी-सी, कुछ सकुचाई फिर धीरे से मुस्कुराई, आप कौन ? इस सवाल … Read more

अपनी धुन

रश्मि लता मिश्रा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ****************************************************************** कोई मैं तो अपनी ही धुन करना दुनिया से क्या ? भक्ति रस लागी लगन करना दुनिया से क्या ? मेरी भक्ति का एतबार कर लो, तुम भी संगीत से प्यार कर लो बढ़ा सरगम में है दम, करना दुनिया से है क्या ? मेरी भक्ति का एतबार कर … Read more

क्यों करता हूँ कागज काले…

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार ‘अजस्र’ बूंदी (राजस्थान) ****************************************************************** क्यों करता हूँ कागज काले ? बैठा एक दिन सोच कर यूँ ही, शब्दों को बस पकड़े और उछाले। आसमान यह कितना विस्तृत, क्या इस पर लिख पाऊंगा! जर्रा हूँ मैं इस माटी का, माटी में मिल जाऊंगा। फिर भी जाने कहां-कहां से, कौंध उतर-सी आती है। … Read more