मुकदमों के बोझ से जटिल होता जीवन

ललित गर्गदिल्ली************************************** लोकतंत्र के ४ स्तंभों में से १ न्याय पालिका इन दिनों काफी दबाव में है। उस पर मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। देश के सर्वोच्च न्यायालय से लेकर विभिन्न अदालतों में मुकदमों का बोझ इस कदर हावी है कि, न्याय की रफ्तार धीमी से धीमी होती जा रही है। अदालतों पर बढ़ते … Read more

सावन मास का पावन पर्व

प्रो. लक्ष्मी यादवमुम्बई (महाराष्ट्र)**************************************** पावन सावन-मन का आँगन… ‘बदरा आ…हाय…बदरा छाए केझूले पड़ गए हाय, कि मेले लग गए हाय…मच गई धूम…रे किआया सावन झूम के…।’४ ऋतु में से वर्षा ऋतु का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है, क्यूंकि भीषण गर्मी से लोगों का हाल बेहाल हो जाता है। ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु का … Read more

यह क्या हो रहा ?

हेमराज ठाकुरमंडी (हिमाचल प्रदेश)***************************************** बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि, यह आज समाज में हो क्या रहा है ? मुद्दा आज सता पक्ष और विपक्ष की तू-तू, मैं-मैं का नहीं है। मुद्दा तो है देश की बहू-बेटियों की अस्मत का। वह चाहे माँ, पत्नी या बहू हो या फिर बेटी,दु:ख यह है … Read more

मनोहरी पावन सावनी मन औ आँगन

डॉ. आशा गुप्ता ‘श्रेया’जमशेदपुर (झारखण्ड)******************************************* पावन सावन-मन का आँगन… सावन! श्रावण! श्रावण ? ओ अच्छा सावन। क्या सावन ? हाँ जी, मैं सावन की ही बात कर रही हूँ। और सावन का सुंदर दृश्य आँखों के सामने आ ही गया। और देखिए! लोगों की अलग- अलग प्रतिक्रियाएं, सावन लग गया है जी। आप जानते हैं … Read more

आया पावन सावन…

डॉ.अनुज प्रभातअररिया ( बिहार )**************************** पावन सावन-मन का आँगन…. सावन का नाम सुनते ही मन के भीतर कई तरह की तरंगें अंगड़ाईयां लेने लगती हैं। मन मस्ती में झूम उठता है। वास्तव में यह मौसम ही कुछ ऐसा है, जिसके दृश्य आँखों को तृप्त तो करते ही हैं, मन को भी प्रफुल्लित‌ कर देता है। … Read more

भाषा पर चिन्ता प्रकट करता समाज

भाषा और संस्कृति के अंर्तसंबंधों पर भारतीय मनीषियों ने हर एक समय-काल में चिंतन किया है। उस चिंतन को अपने वक्तव्यों, विमर्शों, लेखन और संवादों द्वारा समाज तक पहुँचाने की कोशिश भी करता रहा है। अनेक समय-कालों में ये चिंतक सफल हुए हैं। हमारे समयकाल में इनकी चिंताएं समाज ने अनसुनी की हैं। भाषा के … Read more

राजनीतिक चंदे की पारदर्शी व्यवस्था जरूरी

ललित गर्गदिल्ली************************************** वर्ष २०२४ के आम चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का मुद्दा एक बार फिर गरमा रहा है। लोकतंत्र की एक बड़ी विसंगति या कहें समस्या उस धन को लेकर है, जो चुपचाप, बिना किसी लिखा-पढ़ी के दलों, नेताओं और उम्मीदवारों को पहुंचाया जाता है, यानी … Read more

विदेशों में हिंदी की संभावनाएँ और भविष्य

डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’मुम्बई(महाराष्ट्र)********************************************** आजकल देश की बजाए विदेशों में हिंदी की चिंता कुछ ज्यादा ही है। भारत में हिंदी और भारतीय भाषाओं का क्या हाल है, और क्या होगा ? इसके बजाए विदेशों में हिंदी से जुड़ी संगोष्ठियाँ ज्यादा होती दिखती हैं। भारत की २०११ की जनगणना के अनुसार भारत के ५७.१ फीसदी भारतीय … Read more

‘अमेरिका’ भारत का दोस्त है या साहूकार ?

डॉ.अरविन्द जैनभोपाल(मध्यप्रदेश)******************************************* साहूकार को हमेशा कर्ज़दार अधिक प्यारा लगता है। कारण उसके कारण कर्ज़दार उसके प्रति वफादार होता है और उसकी आय का जरिया होता है। दोस्ती में सिर्फ चाय-पानी होता है और रिश्ते टूटने लगते है, पर कर्ज़दार और साहूकार का सम्बन्ध माँ-बेटे जैसा होता है। आज भी अमेरिका का प्रेम पाकिस्तान के प्रति … Read more

फ्रांस-भारत की दोस्ती से दुनिया की बेहतरी

ललित गर्गदिल्ली************************************** भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राएं नए भारत-सशक्त भारत की इबारत लिखने के अमिट आलेख हैं। उनके नेतृत्व में उभरता नया भारत विकसित एवं विकासशील देशों के बीच सेतु बन रहा है। हाल ही में अमेरिका एवं मिस्र की ऐतिहासिक एवं सफल यात्राओं के बाद मोदी फ्रांस की यात्रा पर हैं। … Read more