दिनकर की व्यथा
राजबाला शर्मा ‘दीप’अजमेर(राजस्थान)******************************************* तुम्हीं बताओ तुमको दिनकर,चाहूं, निकट बुलाऊं मैंतेजोमय इतने हो तुम,कैसे पास बिठाऊं मैं ? बहुत परोपकारी हो भास्कर,किससे सीखा तुमने दान!धरती के देव हो तुम तो,जग करता है तुम्हें प्रणाम।हम मानव हैं ऋणी आपके,कैसे खुश कर पाऊं मैं ? जग को उजियारा देते हो,कभी नहीं भी थकते तुमतुम बिन जीवन अंधकारमय,जीव-जगत रहते … Read more