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अपना-अपना घोंसला

डॉ.अर्चना मिश्रा शुक्ला
कानपुर (उत्तरप्रदेश)
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घर-परिवार स्पर्धा विशेष……

गाय भी रंभाती हुई अपने बच्चों पर ममता और प्यार लुटाने को खूँटे तक पहुँचती है,चिड़िया भी घोंसला बनाती है और बच्चों के लिए खाना-पानी जुटाती है। जंगल का राजा शेर भी विश्राम हेतु म्यांद बनाता है,न जाने कितने पशु-पक्षी अपने लिए खोह और बिल बनाते हैं यानी हर जीवित प्राणी अपने और अपने परिवार के लिए घर-परिवार बसाता है।
फिर मनुष्य तो इस संसार की अदभुत रचना है। जो कुछ भी प्रगति दिखाई दे रही है,वह मनुष्य के विकास क्रम की ही कड़ी है। इस विकास प्रक्रिया में घर-परिवार की बहुत बड़ी भूमिका है। उसकी नित नई तरक्की में यह परिवार बिल्कुल कामधेनु के समान समस्त कामनाओं में सिद्धि दिलाता है। घर का मुखिया भगवान विष्णु की तरह लालन-पालन करता है,वहीं परिवार सुखद परिवार के रुप में दिखाई देता है।
जनमानस में प्रिय महाकाव्य ‘रामचरित मानस’ व ‘महाभारत’ से हम सभी परिचित हैं। घर-परिवार की मिसाल हम अयोध्या नगरी में देख सकते हैं,जहाँ प्रत्येक व्यक्ति या पात्र एक-दूसरे के प्रति त्याग व समर्पण की प्रतिस्पर्धा में लगे दिखाई देते हैं। मानस में हमने देखा कि परिवार चलाने में कैसे-कैसे विघ्न आते हैं,क्योंकि ऋद्धि-सिद्धि के आने पर बुद्धि भ्रमित होती ही है। कभी लोभ जागता है तो कभी स्वार्थ। महाभारत में जगह-जगह अन्याय ही हुआ है। मुखिया सदैव मौन धारण करते रहे,गुरु आदि भी अपने वचनों से बँधे रहे। परिणाम यह हुआ कि भाई-भाई के बीच ऐसा विद्वेष पनपा जिसमें पूरा घर-परिवार नष्ट-भ्रष्ट हो गया क्योंकि ‘सोई सयान जो परधन हारी’ घर र्में जब कोई धन हरण करने वाला बुद्धिमान पैदा हो जाता है,वहीं से घर-परिवार कुरुभूमि में बदल जाता है।
परिवार बचाने के लिए कुतर्क और सन्देह का परित्याग करना पड़ता है। एक ही परिवार में पृथक गुण,आचरण व स्वभाव वाले सदस्य होते हैं किंतु जो परिवार के लिए समर्पित मन,वचन,कर्म से होता है,वही परिवार और घर हँसता-खिलखिलाता दिखाई देता है। पुत्र,धन,लोक-प्रतिष्ठा सब बलशाली अंग हैं किसी भी परिवार के लिए। सुखदायक,
कोमल वचन,सरल,सुंदर,प्रेमयुक्त,अत्यन्त पवित्र वाणी ही किसी भी परिवार की आत्मा होती है।
जिस घर में क्लेश न हो,स्वाभाविक संतोष हो वहाँ शांति ही शांति,प्यार ही प्यार की धुन गूँजती है। परिवार तब चलता है,जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी कामनाओं को त्यागकर दूसरों को हृदय से अपनाता है। विश्वास और समर्पण के अभाव में घर,घर नहीं रहता। सभी के प्रति कोमलता,सुशीलता व दयालुता का भाव परिवार को सुख की राशि से भर देता है। सुंदर जीवन और सुख का धाम हमारा घर- परिवार ही होता है।

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