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सरकारी सेवाओं से मातृभाषाओं की बिदाई

डॉ. अमरनाथ,
कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)
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मातृभाषा दिवस विशेष-भाग २….

यूपी बोर्ड की परीक्षा में ८ लाख विद्यार्थियों का हिन्दी में अनुत्तीर्ण होने का समाचार २०२० में सुर्खियों में था। कुछ दिन बाद जब यूपीपीएससी का परिणाम आया तो उसमें भी दो तिहाई से अधिक अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थी सफल हुए। यह संख्या पहले २०-२५ प्रतिशत के आस-पास रहती थी। २०२० का यूपीएससी का परिणाम भी ऐतिहासिक और अभूतपूर्व था। हिन्दी माध्यम वाले सफल अभ्यर्थियों की संख्या सिर्फ ३ प्रतिशत रह गई,मतलब ९७ फीसदी अभ्यर्थी अंग्रेजी माध्यम वाले सफल हुए। समस्या की तह में जाने की कोशिश की तो सिर घूम गया।
देश में अराजपत्रित कर्मचारियों के चयन के लिए कर्मचारी चयन आयोग (स्टाफ सिलेक्शन कमीशन) सबसे बड़ा संगठन है। इस संगठन की परीक्षाओं से हिन्दी को पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। इसकी वेबसाइट पर जाकर देखा,तो सकते में आ गया। कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल की परीक्षा जो ३ सोपानों में आयोजित होती है, उसके प्रत्येक सोपान में क्रमश: इंग्लिश कंप्रीहेंशन,इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड कंप्रीहेंशन तथा डेस्क्रिप्टिव पेपर इन इंग्लिश ऑर हिन्दी है। प्रश्न यह है कि जब आरंभिक २ सोपानों में इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड कंप्रीहेंशन अनिवार्य है तो तीसरे में भला हिन्दी का विकल्प कोई क्यों और कैसे चुन सकता है ? जाहिर है यहाँ हिन्दी का उल्लेख केवल नाम के लिए है।
कंबाइंड हायर सेकंडरी लेवल की परीक्षा में इंग्लिश लैंग्वेज का प्रश्नपत्र है किन्तु हिन्दी का कुछ भी नहीं है। स्टेनोग्राफर्स ( ग्रेड ‘सी’ एण्ड ‘डी’ ) के लिए २०० अंकों की परीक्षा में हिन्दी को पूरी तरह हटा लिया गया है। जूनियर इंजीनियर्स की परीक्षा में हिन्दी का नामोनिशान नहीं है। सब इंस्पेक्टर्स ( दिल्ली पुलिस,सीएपीएफ तथा सीआईएसएफ) की परीक्षा के पहले भाग में ५० अंकों का इंग्लिश कंप्रीहेंशन तो है ही,दूसरे में भी २०० अंकों का सिर्फ इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड कंप्रीहेंशन है। विभिन्न राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में मल्टी टास्किंग (नान टेक्निकल) स्टॉफ के लिए भी २ भागों में बँटी परीक्षा के पहले भाग में जनरल इंग्लिश है और दूसरे में शार्ट एस्से एण्ड इंग्लिश लेटर राइटिंग है। आयोग ने मान लिया है कि हिन्दी में कुछ भी लिखने की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी। इसीलिए हिन्दी के किसी स्तर के ज्ञान की परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। यह सब देखने के बाद कहा जा सकता है कि देश की अराजपत्रित सरकारी नौकरियों के लिए अब हर स्तर पर सिर्फ अंग्रेजी को स्थापित कर दिया गया है और हिन्दी को पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।
राजपत्रित अधिकारियों के चयन के लिए संघ लोक सेवा आयोग तथा विभिन्न राज्यों के लोक सेवा आयोग हैं। संघ लोक सेवा आयोग का गठन अंग्रेजों ने १९२६ में किया था। अंग्रेजों के जमाने में यहाँ परीक्षाओं का माध्यम सिर्फ अंग्रेजी थीं। आजादी के बाद १९५० में इस परीक्षा में सिर्फ ३ हजार प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था और १९७० में यह बढ़कर ११ हजार हुई। देश के दूर- दराज के गाँवों में दबी प्रतिभाओं को भी अपनी भाषा में परीक्षा देने के अवसर उपलब्ध हए तो पर १९७९ में परीक्षा देने वालों की संख्या एकाएक बढ़कर १.१० लाख हो गई। अब हर साल गाँवों के गरीबों के बच्चों की भी एकाध तस्वीर अखबारों में अवश्य देखने को मिल जाती थीं,जिनका चयन इस प्रतिष्ठित सेवा में हो जाता था। शीर्ष पर बैठे हमारे नीति नियामकों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने २०११ में वैकल्पिक विषय को हटाकर उसकी जगह २०० अंकों का ‘सिविल सर्विस एप्टीट्यूट टेस्ट'(सीसैट) लागू किया,जिसमें मुख्य जोर अंग्रेजी पर था। इससे हिन्दी माध्यम वाले परीक्षार्थियों की संख्या तेजी से घटी। इसका राष्ट्रव्यापी विरोध हुआ। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी आन्दोलनकारियों के पक्ष में अपेक्षित निर्देश दिए,तब जाकर २०१४ में आयोग ने कुछ बदलाव किए,किन्तु इसके बाद धीरे-धीरे आयोग ने सीसैट सहित यूपीएससी परीक्षा के नियमों में दूसरे अनेक ऐसे परिवर्तन किए,जिससे हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करना भी कठिन होता गया। २००९ में हिन्दी माध्यम से जहाँ २५.४ प्रतिशत परीक्षार्थी सफल हुए थे,वहाँ २०१९ में यह संख्या घटकर मात्र ३ प्रतिशत रह गई। पहले जहाँ शीर्ष १० सफल अभ्यर्थियों में ३-४ हिन्दी माध्यम वाले अवश्य रहते थे,वहाँ २०१९ में चयनित कुल ८२९ अभ्यर्थियों में हिन्दी माध्यम वाले चयनित अभ्यर्थियों में पहले अभ्यर्थी का स्थान ३१७ वाँ है।
तीन स्तरों पर होने वाली आयोग की इस सर्वाधिक प्रतिष्ठित परीक्षा में हिन्दी माध्यम वालों को अमूमन प्रारंभिक परीक्षा में ही छाँट दिया जाता है। मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए भी न तो उन्हें स्तरीय पाठ्य-सामग्री सुलभ है और न बेहतर कोचिंग की सुविधा क्योंकि आर्थिक दृष्टि से भी वे कमजोर होते हैं। साक्षात्कार में भी हिन्दी माध्यम वालों के साथ भेदभाव किया जाता है। हिन्दी माध्यम वाले अभ्यर्थियों को मिलने वाले प्रश्नों के हिन्दी अनुवाद देखकर तो कोई भी समझदार व्यक्ति सिर पीट लेगा।
प्रश्न निर्माताओं ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के लिए ‘शल्यक प्रहार’, डिजिटलीकरण के लिए ‘अंकीयकृत’,साइंटिस्ट आब्जर्ब्ड के लिए ‘वैज्ञानिकों ने प्रेक्षण किया’,स्टील प्लांट के लिए ‘इस्पात का पौधा’,डेलिवरी के लिए ‘परिदान’,सिविल डिसओबिडिएंस मूवमेंट के लिए ‘असहयोग आन्दोलन’ आदि अनुवाद किया है। इनमें डेलिवरी के लिए ‘वितरण’ तथा डिसओबिडिएँस मूवमेंट के लिए ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ तो बेहद प्रचलित शब्द हैं। इन्हें भी गलत लिखना प्रमाणित करता है कि हिन्दी अनुवाद को गंभीरता से नहीं लिया जाता.
अमूमन सहज ही कह दिया जाता है कि जिन्हें हिन्दी अनुवाद समझ में नहीं आता है उनके लिए मूल अंग्रेजी तो रहता ही है,किन्तु यहाँ समझने की बात यह है कि यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में छ: से सात लाख परीक्षार्थी शामिल होते हैं और उनमें से लगभग तेरह प्रतिशत परीक्षार्थी ही मुख्य परीक्षा के लिए अपनी अर्हता प्रमाणित कर पाते हैं। ऐसी दशा में ०.०१ प्रतिशत अंक का भी महत्व होता है। ऐसी दशा में हिन्दी माध्यम का परीक्षार्थी यदि प्रश्न को समझने के लिए अंग्रेजी मूल भी देखने लगा और ऐसे ५ प्रश्न भी पढ़ने पड़े तो उसका पिछड़ना तय है। प्रतिवर्ष औसतन ऐसे १० प्रश्न अवश्य होते हैं,यही कारण है कि हिन्दी माध्यम वाले परीक्षार्थी आम तौर पर प्रारंभिक परीक्षा में ही बाहर हो जाते हैं।
प्रश्न यह है कि देश के लोक सेवकों को कितनी अंग्रेजी चाहिए ? उन्हें इस देश के लोक से संपर्क करने के लिए हिन्दी सीखनी जरूरी है या अंग्रेजी ? उनके साक्षात्कार अंग्रेजी माध्यम से क्यों लिए जाते हैं ? क्या उन्हें इंग्लैंड में सेवा देनी है ? इस देश के सबसे बड़े पद तो राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के हैं। इन पदों पर बैठे लोगों का काम तो हिन्दी और गुजराती बोलने से चल जाता है और इस देश की जनता बार-बार उन्हें मत देकर उनके कुशल प्रशासन पर अपनी स्वीकृति की मुहर भी लगा देती है।
न्याय के क्षेत्र की दशा यह है कि आज हमारे देश में उच्चतम न्यायालय से लेकर २५ में से २१ उच्च न्यायालयों में हिन्दी सहित किसी भी भारतीय भाषा का प्रयोग नहीं होता है। मुवक्किल को पता ही नहीं होता कि वकील और न्यायाधीश उसके प्रकरण के बारे में क्या सवाल-जवाब कर रहे हैं। उसे अपने बारे में मिले फैसले को समझने के लिए भी वकील के पास जाना पड़ता है और उसके लिए भी उसे पैसे देने पड़ते हैं।
सरकारी नौकरियों,प्रशासन और न्याय व्यवस्था में अंग्रेजी के वर्चस्व के लिए क्या जनता जिम्मेदार है या सरकार और उसकी नीतियाँ ? आज जब शिक्षा को व्यापार और मुनाफे के लिए ज्यादातर निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है,देश की अधिकाँश राज्य सरकारों ने सरकारी विद्यालयों को भी अंग्रेजी माध्यम में बदल दिया है और हमारे नौनिहालों से उनकी मातृभाषाएँ क्रूरतापूर्वक छीन ली हैं। केन्द्रीय और नवोदय विद्यालयों में भी ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि बच्चों की हिन्दी आठवीं-नवीं के बाद ही छूट जाती है। उनके तर्क हैं कि अभिभावकों की यही माँग है। प्रश्न यह है कि जब अफसर से लेकर चपरासी तक की सभी नौकरियाँ अंग्रेजी के बलपर ही मिलेंगी तो कोई अपने बच्चे को हिन्दी पढ़ाने की मूर्खता कैसे करेगा ? निस्संदेह हिन्दी पढ़ने से नौकरी मिलने लगे तो लोग हिन्दी पढ़ाएँगे।
इस देश में तकनीकी,चिकित्सा,प्रबंधन, कानून आदि की शिक्षा तो अंग्रेजी माध्यम से होती ही है, राजधानी के विश्वविद्यालयों में मानविकी और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा भी अंग्रेजी माध्यम से होने लगी है,जबकि पढ़ाने वाले अध्यापक ज्यादातर हिन्दी पट्टी के ही हैं। इन सबके पीछे अंग्रेजी का दिनों-दिन बढ़ता रुतबा है,जिसके लिए सिर्फ सरकारें जिम्मेदार हैं। इससे आसानी से समझा जा सकता है कि अंग्रेजी माध्यम हमारे देश के विकास में कितनी बड़ी बाधा है।
वास्तव में व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएँ सीख ले,किन्तु वह सोचता अपनी भाषा में ही है। हमारे बच्चे दूसरे की भाषा में पढ़ते हैं फिर उसे अपनी भाषा में सोचने के लिए अनुदित करते हैं और लिखने के लिए फिर उन्हें दूसरे की भाषा में अनुवाद करना पड़ता है। इस तरह जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरे की भाषा सीखने में चला जाता है, इसीलिए मौलिक चिन्तन नहीं हो पाता। मौलिक चिन्तन सिर्फ अपनी भाषा में ही हो सकता है,पराई भाषा में हम सिर्फ नकलची पैदा कर सकते हैं। अंग्रेजी माध्यम वाली शिक्षा सिर्फ नकलची पैदा कर रही है।
हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम अपने जिस अतीत पर मुग्ध हैं,उस अतीत की सारी उपलब्धियाँ अपनी भाषाओं में अध्ययन करने का परिणाम थीं, और आज भी यदि कुछ मौलिक अर्जित करना है तो अपनी भाषाओं को अपनाना ही पड़ेगा।
आज भी इस देश की सत्तर प्रतिशत जनता गाँवों में ही रहती है। उनकी शिक्षा ग्रामीण परिवेश की शिक्षण संस्थाओं में ही होती है। इन प्रतिभाओं को यदि मुख्य धारा में लाना है तो उन्हें उनकी अपनी भाषाओं में शिक्षा देना एकमात्र रास्ता है और यही हमारे संविधान का भी संकल्प है।
जोर देकर कहना चाहूँगा कि अंग्रेजी इस देश में सिर्फ एक विषय के रूप में पढ़ाई जानी चाहिए, माध्यम के रूप में किसी भी स्तर पर नहीं। इसके साथ ही नौकरियों में अंग्रेजी की जगह हमारी मातृभाषाओं को वरीयता मिलनी चाहिए।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

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