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जग को पाठ पढ़ायेंगे

पंकज भूषण पाठक ‘प्रियम’
बसखारो(झारखंड)
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यशोधरा का प्रश्न ………..
खुद को दुनिया में बतलाना शुद्ध,
आसान बहुत है बन जाना बुध्द।

किसी की शवयात्रा को देखकर,
एक रात आधी रात को छोड़कर।
गहरी नींद में सोयी पत्नी और
दुधमुँहे बच्चे से यूँ मुँह मोड़कर।
गृहस्थ जीवन से होकर विमुख,
आसान बहुत है बन जाना बुद्ध।

एक पल के लिए सोचा नहीं,
किसके भरोसे छोड़ के जा रहे।
सात जन्मों जो किया था वादा,
यूँ इक पल में तोड़ के जा रहे।
अपने ही वादों से हो कर विरुद्ध,
आसान बहुत है बन जाना बुद्ध।

हाँ आज भी पूछती है यशोधरा,
था आखिर क्या अपराध मेरा ?
मुँह छुपाए इस तरह तेरा जाना,
दुनिया ने तुझे तो देवता माना।
देखा नहीं जीवन से मेरा युद्ध,
आसान बहुत है बन जाना बुद्ध।

तेरी जगह अगर मैं यूँ अकेले,
तुम्हें,घर और बच्चे को छोड़।
लाँघ लेती दहलीज मुँह अंधेरे,
मैं भी यूँ कर्तव्यों से मुँह मोड़।
खूब लाँछन होते मेरे सन्मुख,
आसान बहुत है बन जाना बुद्ध।

अपहृत लाचार विवश थी सीता,
लंका में कैद पर पवित्र थी गीता।
लेकिन कहाँ उस पे किया भरोसा,
ली गयी उसकी भी अग्निपरीक्षा।
तब दुनिया ने माना उसको शुद्ध,
आसान बहुत है बन जाना बुद्ध।

मैं भी अगर सबकुछ यूँ छोड़ कर,
घर-परिवार सबसे रिश्ता तोड़कर।
सत्य ढूँढने आधी रात निकल जाती,
कुलटा विधर्मी जाने क्या कहलाती।
निश्चित मार्ग मेरा हो जाता अवरुद्ध,
आसान बहुत है बन जाना बुद्ध।

यशोधरा का जीवन जी कर देखो,
यूँ रोज जरा-सा विष पी कर देखो।
कैसे हमने था तब खुद को संभाला,
कैसे अकेले दुधमुँहे को था पाला।
करती रही खुद से ही खुद मैं युध्द,
आसान बहुत है यूँ बन जाना बुद्ध।

माना तुम्हें हो गया सत्य का ज्ञान,
मान लिया दुनियां ने भी भगवान।
कहाँ उत्तर मेरा कभी तुम दे पाये,
क्या दुनिया को फिर तुम समझाए।
सदा तुम मेरे प्रश्नों से होकर विमुख,
आसान बहुत है यूँ बन जाना बुद्ध।

भावनाओं की मेरी तुम करके हिंसा,
क्या सिखाते जग को सत्य-अहिंसा।
जीवन से पलायन कोई पर्याय नहीं,
क्या इसके बिना कोई उपाय नहीं ?
सत्य दिखा पर दिखा न मेरा दुःख,
आसान बहुत है बन जाना बुद्ध॥

परिचय- पंकज भूषण पाठक का साहित्यिक उपनाम ‘प्रियम’ है। इनकी जन्म तारीख १ मार्च १९७९ तथा जन्म स्थान-रांची है। वर्तमान में देवघर (झारखंड) में और स्थाई पता झारखंड स्थित बसखारो,गिरिडीह है। हिंदी,अंग्रेजी और खोरठा भाषा का ज्ञान रखते हैं। शिक्षा-स्नातकोत्तर(पत्रकारिता एवं जनसंचार)है। इनका कार्यक्षेत्र-पत्रकारिता और संचार सलाहकार (झारखंड सरकार) का है। सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़कर शिक्षा,स्वच्छता और स्वास्थ्य पर कार्य कर रहे हैं। लगभग सभी विधाओं में(गीत,गज़ल,कविता, कहानी, उपन्यास,नाटक लेख,लघुकथा, संस्मरण इत्यादि) लिखते हैं। प्रकाशन के अंतर्गत-प्रेमांजली(काव्य संग्रह), अंतर्नाद(काव्य संग्रह),लफ़्ज़ समंदर (काव्य व ग़ज़ल संग्रह)और मेरी रचना  (साझा संग्रह) आ चुके हैं। देशभर के सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। आपको साहित्य सेवी सम्मान(२००३)एवं हिन्दी गौरव सम्मान (२०१८)सम्मान मिला है। ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय श्री पाठक की विशेष उपलब्धि-झारखंड में हिंदी साहित्य के उत्थान हेतु लगातार कार्य करना है। लेखनी का उद्देश्य-समाज को नई राह प्रदान करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-पिता भागवत पाठक हैं। विशेषज्ञता- सरल भाषा में किसी भी विषय पर तत्काल कविता सर्जन की है।

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