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दिल को चीरता रोदन

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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बेहद दर्दनाक ख़ौफ की कालिमा
सूरत की सीरत से स्तब्ध,भौंचक्का,
चारों तरफ पसरा मासूम निर्दोष
चीखती मौत का भष्मासुर अनल तांडव,
मचा हाहाकार,दिल को चीरता रोदन
कूदते,चिल्लाते,जलते देश के
होनहार निर्माणक असहाय चिराग।
मर्माहत सूना फिर ममता का आँचल,
जला क्रूर असुर के दावानल में
त्राहि-त्राहि जीवन रक्षण में कूदे,
कोहराम मचा मातु-पिता के जीवन में।
बेदर्द लुटेरों,माफ़िया दरिंदों ने ली
मासूम नाबालिग नौनिहाल जान,
थे कुल चिराग भविष्य निर्माणक
अभिलाषी नवजीवन प्रभात,
यायावर स्वप्निल अनंत व्योम में
नव भारत के शिल्पी होनहार,
नैन सितारे कोख के टुकड़े
जो सपूत माँ की खुशियों का संसार,
क्षत-विक्षत ममता करुणा जीवन आधार
लोभी,लंपट,कातिल,नरभक्षी
राक्षस ने फैलाया शिक्षा कोचिंग मायाजाल,
शिक्षा के नासूर माफ़िया फँसकर
लगी आग चौथी मंजिल पे,
नासमझ चाह शिक्षा को व्याकुल
नादान सुकोमल पढ़ते बच्चे,
भयभीत,अचंभित असहाय चहुँदिक्
इतस्ततः प्राण बचाने को आकुल,
कूद पड़े चौथी मंजिल से
बाइस बच्चों ने अकाल गँवायी जान,
न कोई व्यवस्था अग्निशमन की
एक बंद द्वार,सोपान एक बस,
दूर बहुत फ़ायर ब्रिगेड था
जालियाँवाला बाग त्रासदी,
था समवत डायर अभियान,
छूट प्रशासन उन शिक्षा गिरोह को
चला रहा था मौत गेह शैतान,
कुछ वीर बहादुर बेपरवाह स्वयं से
चढ़े भवन दीवार सोपान,
जान पे खेलकर कुछ मासूमों को
भगवान् बना दिया प्राण वरदान,
शोक जता,फिर जाँच बिठा
दी चंद अनुदानी सिक्के लुटे आहत को भीख,
घटनाएँ ऐसी अनवरत घटित हो रही
गाँव,नगर पालिका,महानगर हर बार,
महाकाल कवलित आहत की
नहीं पड़ रही दर्दनाक सुनाई चीख,
लोकतंत्र की महाजीत और
राजनीति के जनसिपहसालार,
नेतागण झूम रहे गा विजयगीत।
हार के सदमे में सराबोर
अपने भविष्यार्थ चिन्ताकूल,
चिन्तना मशगूल सत्तालोलुप नेतागण
नदारद सूरत के कालकवलित मासूमों से।
स्वार्थ की कालिमामय गह्वर में छिपे,
जनता के प्रतिनिधि,सेवक नेता
जेता से लेकर ग्राम प्रधान पार्षद तक,
सब नदारद,बिलखते चीत्कार से अनसुने
विधायक,सांसद,मंत्री,प्रशासक,
शोक संवेदना की लगी होड़
संवेदनशून्य अन्तःकरण देते भरोसा,
जाँच और सख़्त दण्ड दान का
न्याय के थोथे वरदान की नवाशा,
आख़िर कौन गुनाहगार या कातिल
इस मासूम ए दहलाने वाले कत्ल का,
कब तक चेतेगी सरकार,बंद होगी
माफ़ियागिरी,शैतानी खूनी ख़ौफ,
कौन भरेगा सूनी कोख
और ममता की छाती जो
कलेजे के टुकड़ों को चिपकायी थी अनवरत,
कैसे सूखेंगे नैनाश्रु अविरल अबाध निच्छल
सिसकती-कराहती चितवन अहर्निश रोदन,
कटेगी जिंदगी निर्दोष दर्दिल अवसाद में
अपनी सारी खुशियों के पारावार,
दुलारे लालों कों सदा के लिए खोकर
साझा करेगी किससे आप-बीती दु:खनुमा,
झेलेगी टीस बेटों को खोने की जीवनभर माँ।
सारे अरमान,जिंदगी की सारी मेहनत,
तन-मन-धन अपना अपने कुलदीपक
औलादों को सर्वस्व लूटाने को समुद्यत,
शोक नैनाश्रुपूरित निःशब्द असहाय मौन पिता।
शोकसंतप्त विह्वल श्रद्धाञ्जलि,
नमन पुष्पार्पण क्रन्दित मानस पटल
करता है कवि निकुंज अहर्निश संवेद स्वरll

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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