आत्मजा
विजयलक्ष्मी विभा इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश) ********************************************************* ‘आत्मजा’ खंडकाव्य से अध्याय-६ वन मयूर को रहा न जाता, बिना बुलाये अपना दर्शक रंग-बिरंगे पंख खोल कर, किसे दिखाये नृत्य प्रदर्शक। चातक किसे सुनाये अपनी, मधुर-मधुर वह मौलिक कविता जिसके भावों से आच्छादित, नभ में स्वयं न दिखता सविता। भर-भर कूप उड़ेला करती, धो-धो घट ऊपर से चपला घट-घट यहाँ … Read more