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दातून करना भूल चुके हो…तो

राधा गोयल
नई दिल्ली
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“आए दिन तुम्हारे दाँतों में कुछ न कुछ समस्या होती ही रहती है। डॉक्टर के पास ही चक्कर लगते रहते हैं, लेकिन फर्क कुछ नहीं पड़ा। कोलगेट टूथपेस्ट छोड़ा तो डॉक्टर के कहने पर पैप्सोडेण्ट शुरू कर दिया।“ 
  “तो आप ही बताओ ना कि क्या करें ? दाँत किस पेस्ट से साफ करें ?”
   “दातून से। यानी दातून करना भूल चुके हो…तो वापसी कीजिए, वरना दाँतों की बीमारी के साथ-साथ डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन के मरीज भी बन जाओगे।
सन १९९० से पहले कितने लोगों को डायबिटीज़ होता था ? कितने लोग हाइपरटेंशन से त्रस्त थे ? नब्बे के दशक के साथ हर घर में एक डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर का रोगी आ गया, क्यों ? बहुत सारी वजहें होंगी, जिनमें हमारे खान-पान में बदलाव को सबसे खास माना जा सकता है। 
    बदलाव के उस दौर में एक चीज बहुत ख़ास थी, जो खो गयी, पता है ना क्या है वो ?”
  “क्या है वो चीज ?”
  “वो है दातून। गाँव-देहात में आज भी लोग दातून इस्तमाल करते दिख जाएंगे, लेकिन शहरों में दातून पिछड़ेपन का संकेत बन चुका है।
    गाँव-देहात में डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन के रोगी यदा-कदा ही दिखेंगे या ना के बराबर ही होंगे। वजह साफ है, ज्यादातर लोग आज भी दातून करते हैं। तो भई, डायबिटीज़ और हाइ ब्लडप्रेशर के साथ दातून का क्या संबंध, यही सोच रहे हो ना ?..तो आज आपका दिमाग हिल जाएगा… और फिर सोचिएगा, हमने क्या खोया, क्या पाया ?
    ये जो बाज़ार में टूथपेस्ट और माउथवॉश आ रहे हैं ना, ९९.९ प्रतिशत सूक्ष्मजीवों का नाश करने का दावा करने वाले, उन्हीं ने सारा बंटाधार कर दिया है।
    ये माउथवॉश और टूथपेस्ट बेहद स्ट्राँग एंटीमाइक्रोबियल होते हैं और हमारे मुँह के ९९ से ज्ज्यादा सूक्ष्मजीवों को वाकई मार गिराते हैं। इनकी मारक क्षमता इतनी जबर्दस्त होती है, कि मुँह के उन जीवाणु (बैक्टिरिया) का भी खात्मा कर देते हैं, जो हमारी लार (सलाइवा) में होते हैं और ये वही जीवाणु हैं जो हमारे शरीर के नाइट्रेट (NO३-) को नाइट्राइट (NO२-) और बाद में नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) में बदलने में मदद करते हैं। 
   जैसे ही हमारे शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड की कमी होती है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है। ये मैं नहीं, दुनिया भर की रिसर्च स्ट्डीज़ बताती हैं कि नाइट्रिक ऑक्साइड का कम होना ब्लड प्रेशर को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। 
  नाइट्रिक ऑक्साइड की यही कमी इंसुलिन रेसिस्टेंस के लिए भी जिम्मेदार है। समझ आया खेल ? 
  नाइट्रिक ऑक्साइड कैसे बढ़ेगा ? जब इसे बनाने वाले जीवाणु का ही काम तमाम कर दिया जा रहा है ? ब्रिटिश डेंटल जर्नल में २०१८ में तो बाकायदा एक अध्ययन छपा था, ’माउथवॉश यूज़ और रिस्क ऑफ डायबिटीज़’। इसमें बाकायदा ३ साल तक उन लोगों पर अध्धयन किया गया, जो दिन में कम से कम २ बार माउथवॉश का इस्तमाल करते थे और पाया गया कि ५० प्रतिशत से ज्यादा लोगों को प्री-डायबिटिक या डायबिटीज़ की कंडिशन का सामना करना पड़ा।
अब बताओ करना क्या है ? कितना माउथवॉश यूज़ करेंगे ? कितने टूथपेस्ट लाएंगे सूक्ष्मजीवों को मार गिराने वाले ? 
  दाँतों की फिक्र करने के चक्कर में आपके पूरे शरीर की बैंड बज रही है। गाँव-देहात में तो दातून का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है और ये दातून मुँह की दुर्गंध भी दूर कर देते हैं और सारे जीवाणु का खात्मा भी नहीं करते। 
 आदिवासी लोग टूथपेस्ट, टूथब्रश क्या होते हैं, जानते तक नहीं। अब आप सोचेंगे, कि गुरु जी ने टूथपेस्ट और माउथवॉश को लेकर इतनी पंचायत कर ली, तो दातून के प्रभाव को लेकर किसी क्लिनिकल स्टडी की बात क्यों नही की ?
तो भई, अब दातून से जुड़े अध्ययन की भी बात हो जाए। बबूल और नीम की दातून को लेकर एक क्लिनिकल स्टडी जर्नल ऑफ क्लिनिकल डायग्नोसिस एंड रिसर्च में छपी और बताया गया कि स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटेंस की वृद्धि रोकने में ये दोनों जबर्दस्त तरीके से कारगर हैं। 
ये वही जीवाणु है जो दाँतों को सड़ाता है और कैविटी का कारण भी बनता है। वो सूक्ष्मजीव जो नाइट्रिक ऑक्साइड बनाते हैं जैसे एक्टिनोमायसिटीज़, निसेरिया, शालिया, वीलोनेला आदि दातून के शिकार नहीं होते, क्योंकि इनमें वो हार्ड केमिकल कंपाउंड नहीं होते जो माउथवॉश और टूथपेस्ट में डाले जाते हैं। 
  चलते -चलते एक बात और बता दूँ, आदिवासी दाँतों पर दातून घुमाने के बाद एकाध बार थूकते है, बाद में दाँतों पर दातून की घिसाई तो करते हैं और लार को निगलते जाते हैं ? लिंक समझ आया ? लार में ही तो असल खेल है। ये हिंदुस्तान का ठेठ देसी ज्ञान है बच्चों।
   ज्यादा पंचायत नहीं, मुद्दे की बात ये है कि वापसी करो, थोड़ा भटको और चले आओ दातून की तरफ… कसम से।
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