हे माँ

एन.एल.एम. त्रिपाठी ‘पीताम्बर’  गोरखपुर(उत्तर प्रदेश) *********************************************************** तू अवनि अवतारी, पर्वत की बाला दुःख हरने वाली, जग कल्याणी! जय अम्बे जय जगदम्बे!! तू सीता सावित्री, पार्वती विघ्नेश्वरी भुनेश्वरी बाघम्बरी, चंडी चंडिका मनसा महिमा, मनोकामना! तू अवनि अवतारी, पर्वत की बाला दुःख हरने वाली, जग कल्याणी! जय अम्बे जय जगदम्बे!! तू लक्ष्मी गौरी, शिवा वैष्णवी रुक्मणि राधा, … Read more

बारिश

डॉ.सरला सिंह दिल्ली *********************************************** बारिश की बूंदों के मोती, नवजीवन बन बरस रहे। जन-जन की पीड़ा हरते, तप्त धरा हैं शीतल करते। झुक-झुक करते धन्यवाद, वृक्षों के समुदाय समस्त। नदियों की लहरें लहराकर, गाती स्वागत गीत हैं मानों। चमकीली मोती-सी लगती, बारिश की हैं सुन्दर-सी बूंदें। कोयल गीत सुनाती मधुरिम, संग में मयूर के मोहक … Read more

आरती

डॉ.चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि’ रोहतक (हरियाणा) ******************************************************* आरती श्रद्धा-विश्वास स्रोत है, भक्ति-शक्ति से ओतप्रोत है। जो आरती हृदय समाता है, पत्थर भी पूज्य हो जाता है। आरती शक्ति का मन्त्र है, किन्तु भक्तों में अंतर है। भगवान को प्रिय होती है, ह्रदय मंदिर की ज्योति है। आरती है एक-नाम विश्वास, आरती ऋद्धि-सिद्धि प्रयास। आरती हृदय का … Read more

मजदूरों के नाम पर मजाक

ओम अग्रवाल ‘बबुआ’ मुंबई(महाराष्ट्र) ****************************************************************** परिभाषा मजदूर की,पूछ रहे हैं आप। ‘बबुआ’ इतना जानिए,जीवन का अभिशाप॥ दीन-हीन कुंठित पतित,भूखा फिर लाचार। बबुआ है मजदूर का,इतना-सा व्यापार॥ सभी सृजन के मूल में,छिपा हुआ मजदूर। बबुआ कैसे हो गया,फिर आँखों से दूर॥ आसमान चादर बना,धरती बन गई खाट। मजदूरों के बस यही,बबुआ देखे ठाठ॥ मजदूरों के नाम … Read more

रिश्ता

कृष्ण कुमार सैनी ‘राज’ दौसा(जयपुर ) *************************************************** पूज्य पिता जी की बाँहों में, जीने का किरदार छिपा हैll ममतामई माँ के ‘रिश्ते’ में, अमर प्रेम संसार छिपा हैll बहिना के राखी धागों में, पूजा पुण्य प्रणाम छिपा हैll नमन वंदना करके देखो, सच में चारों धाम छिपा हैll पिता-पुत्र के ‘रिश्ते’ में, साहस त्याग निदान … Read more

पृथ्वी पर बचे रहें उनके चिन्ह

डाॅ.आशा सिंह सिकरवार अहमदाबाद (गुजरात )  **************************************************************** जब देखती हूँ मैं उगते सूरज को, उनकी बेचैनी उनकी तड़प, उनकी जीने की चाहत और दीनता उनकी अंधेरे से लड़ाई, सबका सब मेरी नसों में उतरता जाता है…। करोड़ों-करोड़ों लोग जो नहीं देख पा रहे हैं सूरज, उनके लिए सूरज को अपनी हथेली पर उगाना चाहती हूँ…। … Read more

रुला तो न दोगे..

बोधन राम निषाद ‘राज’  कबीरधाम (छत्तीसगढ़) ******************************************************************** (रचनाशिल्प:फाऊलुन×४, १२२ १२२ १२२ १२२) कहीं तुम मुझे यूँ भुला तो न दोगे। कि सपने सुहाने जला तो न दोगे॥ कयामत की रातें जुदाई की बातें, अगर दिल मिले तो रुला तो न दोगे। हजारों में तू एक दिल में बसी हो, सितमगर ये दामन उड़ा तो न … Read more

पत्ते की व्यथा

दुर्गेश राव ‘विहंगम’  इंदौर(मध्यप्रदेश) ************************************************** तरु से गिरा पत्ता तल में आ गिरा तरु के, समीर के संग, उड़ता चला जाए नहीं चलती कोई सत्ता, राह में धूल से लपेटे हुए राहगीरों के पैरों तले दबता, कभी काँटों में अटकना तो कभी गड्ढों में सड़ना, दिनकर की रोशनी से जल उठता सुख कर चूर-चूर हो … Read more

अथ स्वरुचिभोज प्लेट व्यथा

नरेंद्र श्रीवास्तव गाडरवारा( मध्यप्रदेश) ***************************************************************** सलाद, दही बड़े, रसगुल्ले, जलेबी, पकौड़े, रायता, मटर पनीर, दाल, चावल, रोटी, पूरी के बाद… ज्यों ही मैंने प्लेट में पापड़ रखा, प्लेट से रहा न गया और बोली- अब बस भी करो, थोड़ा सुस्ता लो पहले इतना तो खा लो। घर में तो, एक गिलास पानी के लिये पत्नी … Read more

माँ,जहाँ में मैं भी आना चाहती हूँ

वकील कुशवाहा आकाश महेशपुरी कुशीनगर(उत्तर प्रदेश) *************************************************************** भैया के ही जैसे हर पल खिलखिलाना चाहती हूँ, माँ नहीं मारो,जहाँ में मैं भी आना चाहती हूँ। है यही बस लालसा देखूँ ज़माने को जरा मैं, कुदरती रंगीनियाँ दिलकश खजाने को जरा मैं। तुम भले ही मुख नहीं यह देखना हो चाहती पर, चाहती देखूँ तुम्हारे मुस्कुराने को … Read more