चाहे जितने तीर चुभा रे…
विजयलक्ष्मी विभा इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश)************************************ मेरा दिल तूणीर पुराना,चाहे जितने तीर चुभा रे। एक तीर की पीड़ा ही तो,सहन न करता जग अलबेला।पर अनगिन तीरों की चोटें,सहता है तूणीर अकेला।बन जाये दिल तीर स्वयं ही,इतनी इसकी पीर बढ़ा रे…। पहले इन्हें संजो कर रख लूं,तू जो तीर चलाता मुझ पर।चला चुकेगा जब तू सारे,छोड़ूंगी मैं एक-एक कर।कहां छिपेगा … Read more