हमारे संस्कारों की जड़ पितर ही

नीलम प्रभा सिन्हाधनबाद (झारखंड)****************************** पितर ही हमारे जीवन में संस्कारों की नींव हैं। बड़े वृक्ष चाहे कितने ही ऊँचे क्यों न हों, उनकी जड़ें धरती में ही होती हैं; उसी प्रकार हमारे संस्कारों की जड़ हमारे पितरों और पूर्वजों में होती है। उनके दिए हुए संस्कार ही जीवन में हमारे काम आते हैं। संस्कार एक … Read more

आज सबसे बड़ी जरूरत ‘वसुधा संरक्षण’

राधा गोयलनई दिल्ली*********************************** आज हमें यह सोचना पड़ेगा कि हमारी सबसे बड़ी जरूरत क्या है ?प्रगति के नाम पर विनाश या प्रकृति की रक्षा करना ? जो जीवों की रक्षा करते हैं, उन साधनों को नष्ट करना या उनको बचाना ? पुरानी परम्पराओं की बलि चढ़ाना या उनसे कुछ सीखना ?      हमारे वेद … Read more

‘नाना’ किरदारों में उतर जाने वाला अभिनेता

अजय जैन ‘विकल्प’इंदौर (मध्यप्रदेश)************************************ ऐतिहासिक भारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता पर्दे पर आते हैं और किरदार निभाकर चले जाते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं, जो किरदार को अपनी मौजूदगी से नई पहचान दे देते हैं। नाना (विश्वनाथ) पाटेकर इसी दूसरी श्रेणी के अभिनेता रहे। उनकी आवाज में ठहराव था, संवादों में धार और आँखों … Read more

नाना पाटेकरःअभिनय की आग में तपा असाधारण कलाकार

ललित गर्गदिल्ली**************************** भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना है। नाना पाटेकर उन्हीं विरले कलाकारों में से एक थे। वे अभिनेता थे, रंगकर्मी थे, निर्देशक थे, लेखक थे, सामाजिक सरोकारों से जुड़े संवेदनशील नागरिक थे और भारतीय सेना के प्रति गहरे सम्मान एवं समर्पण … Read more

बुढ़ापा आ गया तो क्या…?

ममता सिंह ‘विशिष्ट’धनबाद (झारखंड)******************************* मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना है- बाल रंगने से कोई जवान नहीं हो जाता। बुढ़ापे में इतना फैशन, क्या बात है। दूसरों को शर्मिन्दा करते हैं,न खुद चैन से जीते हैं और न दूसरों को चैन से जीने देते हैं। आखिर क्यों हम दूसरों की ज़िंदगी में ताक-झांक करते हैं … Read more

कैसा श्राद्ध…?

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)****************************** ८०वर्षीय सुशीला जी जब से लकवाग्रस्त हुई हैं, चारपाई से लग गई हैं। एक सेविका सुबह-शाम आकर उनकी दैनिक क्रियाएं करवाने के बाद नाश्ता, फिर खाना और दवाई देकर चली जाती है। उनकी जुबान पर भी लकवे का असर हुआ है, इसलिए उनके मुँह से स्पष्ट शब्द नहीं निकल पाते।  आज सेविका … Read more

मातृभाषा माध्यम में उच्च शिक्षा भविष्य की ओर व्यावहारिक कदम

डॉ. शैलेश शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)*********************************** भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, वह चिंतन की धुरी है। जिस भाषा में मनुष्य सपने देखता है, तर्क करता है और सवाल पूछता है, उसी भाषा में यदि उसे ज्ञान मिले तो उसकी ग्रहणशीलता कई गुना बढ़ जाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में उच्च शिक्षा का माध्यम क्या … Read more

रिश्वत के महल और भ्रष्ट व्यवस्था

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )******************************************** अब हर तरफ देखो, तो सिर्फ धन-धन की झंकार सुनाई देती है, क्योंकि भ्रष्ट लोगों का खेल-तमाशा इतना आधुनिक हो गया है। काले को सफ़ेद करने में जरा-सी भी देर नहीं लगती है। इस तमाशे को देखते तो सब लोग हैं, लेकिन इस जहां में इस पर बोलता कोई नहीं है। … Read more

आवश्यकता प्रक्रिया में विश्वसनीयता की

ललित गर्गदिल्ली**************************** भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका मतदाता है और मतदाता की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पहचान उसका मताधिकार है। इसलिए मतदाता सूची केवल नामों का प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। जिस व्यक्ति का नाम पात्र होते हुए मतदाता सूची में नहीं है, उसकी लोकतांत्रिक भागीदारी अधूरी रह जाती है … Read more

समझना होगा स्वतंत्रता का सही अर्थ

नीलम प्रभा सिन्हाधनबाद (झारखंड)****************************** “हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती,स्वयं प्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती।”     इन अमर पंक्तियों के रचयिता राष्ट्रकवि जयशंकर प्रसाद हैं। यह प्रसिद्ध पंक्ति हमें बताती है कि भारतवर्ष के लिए स्वतंत्रता कितनी महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राष्ट्र स्वतंत्र रहना चाहता है। जो भी परतंत्र होता है, वह बंधनों से … Read more