राजनीतिक चंदे की पारदर्शी व्यवस्था जरूरी

ललित गर्गदिल्ली************************************** वर्ष २०२४ के आम चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का मुद्दा एक बार फिर गरमा रहा है। लोकतंत्र की एक बड़ी विसंगति या कहें समस्या उस धन को लेकर है, जो चुपचाप, बिना किसी लिखा-पढ़ी के दलों, नेताओं और उम्मीदवारों को पहुंचाया जाता है, यानी … Read more

विदेशों में हिंदी की संभावनाएँ और भविष्य

डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’मुम्बई(महाराष्ट्र)********************************************** आजकल देश की बजाए विदेशों में हिंदी की चिंता कुछ ज्यादा ही है। भारत में हिंदी और भारतीय भाषाओं का क्या हाल है, और क्या होगा ? इसके बजाए विदेशों में हिंदी से जुड़ी संगोष्ठियाँ ज्यादा होती दिखती हैं। भारत की २०११ की जनगणना के अनुसार भारत के ५७.१ फीसदी भारतीय … Read more

‘अमेरिका’ भारत का दोस्त है या साहूकार ?

डॉ.अरविन्द जैनभोपाल(मध्यप्रदेश)******************************************* साहूकार को हमेशा कर्ज़दार अधिक प्यारा लगता है। कारण उसके कारण कर्ज़दार उसके प्रति वफादार होता है और उसकी आय का जरिया होता है। दोस्ती में सिर्फ चाय-पानी होता है और रिश्ते टूटने लगते है, पर कर्ज़दार और साहूकार का सम्बन्ध माँ-बेटे जैसा होता है। आज भी अमेरिका का प्रेम पाकिस्तान के प्रति … Read more

फ्रांस-भारत की दोस्ती से दुनिया की बेहतरी

ललित गर्गदिल्ली************************************** भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राएं नए भारत-सशक्त भारत की इबारत लिखने के अमिट आलेख हैं। उनके नेतृत्व में उभरता नया भारत विकसित एवं विकासशील देशों के बीच सेतु बन रहा है। हाल ही में अमेरिका एवं मिस्र की ऐतिहासिक एवं सफल यात्राओं के बाद मोदी फ्रांस की यात्रा पर हैं। … Read more

११वीं-१२वीं में भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता प्रशंसनीय

प्रेमपाल शर्मादिल्ली****************************** निर्णय…. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले एनसीईआरटी के नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क समिति की इस सिफारिश की तारीफ की जानी चाहिए, जो उन्होंने ११वीं १२वीं कक्षाओं में २ भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता बताई है। यह नई शिक्षा नीति का शायद व्यवहारिक और प्रभावी कदम होगा। मनुष्य बाकी जीवों से अपनी भाषा के कारण ही अलग … Read more

हिंसक राजनीति-लोकतंत्र पर बदनुमा दाग

ललित गर्गदिल्ली************************************** राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को हिंसक प्रतिस्पर्धा में नहीं बदला जा सकता, लोकतंत्र का यह सबसे महत्वपूर्ण पाठ पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दलों को याद रखने की जरूरत है। पश्चिम बंगाल में इन दिनों पंचायत चुनाव के दौरान व्यापक हिंसा देखने को मिली, इससे पूर्व वर्ष २०१३ और १८ के पंचायत … Read more

देश-विदेश में हिन्दी का प्रतिष्ठापन हो

रत्ना बापुलीलखनऊ (उत्तरप्रदेश)***************************************** पृथ्वी के विराट रूप की कल्पना में जहाँ ओ$म की ध्वनि प्रतिध्वनित होती है, वह क्या है। हम लोगों की एक-दूसरे के प्रति भावनाओं का आदान-प्रदान ही तो है। हमारे वेद मंत्र, ऋचाएँ सभी का मूल संस्कृत भाषा है, जो स्वयं ही एक गीतात्मक लयात्मकता को धारण किए हुए है। इसी संस्कृत भाषा … Read more

हम पहनावे से आधुनिक माने जाएंगे या सोच से!

डॉ.अरविन्द जैनभोपाल(मध्यप्रदेश)******************************************* वैसे खान-पान, पूजा-पाठ कपड़ा पहनना ये सब व्यक्तिगत-निजता है, इसमें किसी को कोई विवाद-तर्क-समझाइश देने या करने की जरुरत नहीं है, पर जब मर्यादाओं की सीमाओं का उल्लंघन होता है तो पर उन पर प्रतिबन्ध लगाने की जरुरत क्यों पड़ती है ?आज खान-पान पहनावे पर बहुत अधिक चर्चा के साथ विवाद हो रहा … Read more

वित्तीय क्षेत्र में डिजिटलाइजेशन आवश्यक

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’बीकानेर(राजस्थान)********************************************* प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी सब तरफ सुधार के पक्षधर हैं और वे न केवल सभी क्षेत्र में प्रचलित नियमों में भी सुधार हेतु सुझाव आमन्त्रित किए हुए हैं, बल्कि सभी सरकारी रिकॉर्ड का द्रुतगति से डिजिटलाइजेशन भी करा रहे हैं, इसलिए वित्तीय क्षेत्र विशेष रूप से शेयर निवेश से सम्बन्धित कुछ सुधार … Read more

विधवा विवाह:सामाजिक मान्यता मिले, यह धर्म-शास्त्र विरोधी नहीं

अमल श्रीवास्तव बिलासपुर(छत्तीसगढ़) *********************************** ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी के अथक प्रयासों के फलस्वरूप भारत में १८५६ में विधवा (कल्याणी) विवाह को कानूनी मान्यता तो मिल गई है, पंरतु समाज में अभी भी इसकी पूर्णतः स्वीकार्यता नहीं है। कुछ रुढ़िवादी पुरातन पंथी लोग इसे धर्म और शास्त्र के विरूद्ध बताते हैं। परमेश्वर ने जब इस सृष्टि का … Read more