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अनुत्तरित लहरें

डॉ.हेमलता तिवारी
भोपाल(मध्य प्रदेश)
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अनु तेजी से सोचती जा रही थी। माथे पर पड़ी शिकन साफ बता रही थी कि समस्या बहुत उलझी हुई है। अचानक खीज उठी..ये बस भी कितनी धीमी चल रही है,मगर बस धीमी चल कहाँ रही थी,वह तो अनु का दिमाग़ तेज़ गति से चल रहा था। जैसे-जैसे विजय का शहर क़रीब आया,थोड़ी उमंग-सी उठी दिल में…लेकिन सर उठाते ही कुचल दिया,नहीं बस अब और नहीं…बहुत हो गया। आज विजय से दो टूक बात कर लेगी…या तो वह उससे विवाह कर ले,अन्यथा संबंध तोड़ ले।बस,अब संबंधों की बोझिल थकान और नहीं सही जाती। आख़िर कब तक इस मानसिक अंतर्द्वंद से घिरी रहेगी… कब वह निश्चिंत होगी…क्या वह इसी तरह अवैधानिक संबंधों का बोझ ढोती रहेगी…क्या उसकी इच्छा नहीं होती कि किसी की बाँहों में वह भी निश्चिंत होकर सो सके। किसी के सीने में मुँह छुपा कर वह भी सारी दुनिया की नज़रों से छिप सके,मगर विजय समझता कहाँ है…उसे तो अपनी मम्मी-अपने पापा से कहते हुए डर लगता है।
इंतज़ार करो..सब्र करो…मगर कब तक…! दो बरस हो गए इन छुपे-छुपे विवादग्रस्त संबंधों की नींव पड़े…मंज़िलें खड़ी हो गईं,मगर छत..छत आज तक नहीं पड़ी…कितनी धूप है..अब तो ये धूप झुलसाने लगी है तन- मन आत्मा को। एक लिजलिजा अहसास कचोट जाता है दिल को…। एक आत्मिक गहराई की चाह किस वासना के दलदल में घसीट ले गई। पुरुष अस्थिर क्यों होते हैं ? आँखों में क्यूँ नहीं डूबते…उंगलियों से क्यूँ नहीं बोलते? न वह सिर्फ शरीर से बोलते हैं…शरीर से। माँस लगी हड्डी चंचोड़ते कुत्ते की याद हो आती है,मगर वह मना क्यूं नहीं कर देती… क्यूं आत्मसमर्पण कर देती है ? सिर्फ इसलिए कि इस वासना में ही थोड़ा-सा स्नेह मिल जाएगा ? मगर नहीं,वह वासना में स्नेह क्यूं खोजती है,वासना को ही स्नेह क्यूं नहीं मान लेती ? लेकिन उसका मन- उसकी पवित्र भावनाएं और उसकी गहराई वासना के उथलेपन और अस्थिरपन से कैसे समझौता करे ? इसी में तो उसका दिमाग उलझा रहता है। आज निश्चित रूप से वह विजय से कह देगी-रास्ते भर उसने जो-जो बोलने के लिए याद किया है,वह सब एक साँस में बोल जाएगी-कह देगी कि उसे ये अनैतिक संबंध सहन नहीं होते-वह विवाह करना चाहती है-वह निश्चिंत होना चाहती है, मगर…उसका जो व्यक्तित्व है कठोर-अक्खड़ -विवादग्रस्त उसका क्या होगा ? क्या वह सामान्य नहीं हो जाएगी ? लोग यही समझेंगे कि अनु नाम की लड़की जितनी विवादग्रस्त और दबंग थी,उतनी ही…आगे कल्पना भी नहीं कि गई उससे…।
विजय की सीमा-रेखाओं को याद करके जी में मितली-सी होने लगी। घर से निकलना तो साथ में किसी के…शाम को कहीं न जाना… दोस्तों से किनारा करना पड़ेगा…सामान्य घरेलू औरत की तरह रहना पड़ेगा…आगे वह और नहीं सोच सकी। मन का आक्रोश सीमा पार करने लगा था। सुनहरे ख्वाब एक झटके से टूट गए। नहीं-वह विजय से संबंध तोड़ लेगी,मगर वह जिएगी कैसे…! उस रिक्तता को भरेगी कैसे..? जो संबंध टूटने पर मिलेगी। उसे अपनी ही आँखों से बहते आँसूओं और विजय के घुटनों पर टिका हुआ अपना चेहरा याद आ गया…मन चीख उठा काश..! वह भी उन लड़कियों की तरह होती जो हर संबंध सामान्य ढंग से लेती हैं,मगर ऐसी कितनी लड़कियां होती हैं…वह कितनी मज़बूर है।
शहर की दादा लडक़ी…हर किसी के मन का आतंक। कोई भरोसा करेगा.. कि वह रोती है। किसी के सामने झुकती है। अपनी भावनाओं का अपने हाथों गला घोंटती है। इस दोहरे व्यक्तित्व के भयानक अन्त की कल्पना कहीं अंदर तक उसे सिहरा गई। काश…! वह सिर्फ वह होती। कैसे वह विजय की बातों में आ गई ? क्यों वह अपने से छल करती है ? क्यों वह चाहती है कि विजय उसके रूप-उसके गुणों की प्रशंसा करे,मगर विजय तो गुणों में भी दोष देखता है। वह उसे रूठने पर मनाता क्यूँ नहीं। उसे बहुत गुस्सा आता है…तो वह विजय को मुक्के मारती है…तब विजय उसे बाँहों में भरकर प्यार क्यूं नहीं करता…विजय तो सिर्फ गुस्सा करता है। अचानक अनु के विचारों के प्रवाह को विराम लग गया। बस एक झटके से रुक गई थी। बस स्टॉप से विजय का घर दस मिनट की दूरी पर था। कदमों की गति विचारों की तुलना में बहुत ही धीमी हो गई थी। विजय शहर में ही किसी के फार्म हाउस में रहता था…देखते ही बोल उठा..-“अरे आओ अनु…मुँह-हाथ धो लो,थक गई होगी। विजय ने कुएं से पानी निकाल दिया। टॉवेल लेते हुए अनु का हाथ काँप-सा गया। चलो खाना खाने चलते हैं।” विजय के कहते ही मन की कठोरता कुछ पिघलने-सी लगी। खाना खाते-खाते विजय कहता रहा,-“थोड़ा और ले लो… थोड़ा सा बस..।”
घर लौटते ही बिस्तर डाल दिया। कुछ देर बात करते रहे। मन में उठती बातें सिर झुका-झुका लेतीं। रात को विजय की बाँहें अनु को ढूंढने लगीं। अनु मना करते-करते भी विजय के आग्रह को टालने में असमर्थ हो गई। विजय के सीने में सिर छुपाते हुए बस में उपजी हुई घृणा-नफ़रत की उत्ताल लहरें कहीं खो गई। एक गहरी साँस लेकर-उस ‘गुजरे हुए दो घंटे के बस के सफर को’ कुछ और आगे टालकर अनु ने अपनी बाँहें विजय के गले में डाल दीं।

परिचय-डॉ.हेमलता तिवारी का जन्म १४ नवम्बर १९६५ को सागर में हुआ हैl वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निवास है,जबकि स्थायी पता भोपाल(मध्य प्रदेश) हैl बी.एस-सी,(जीवविज्ञान)बी.ए.(संगीत), एम.ए (संगीत, इतिहास, दर्शन,लोक प्रशासन,एजूकेशनल सायकोलॉजी, क्लीनिकल साय.,आर्गेनाइजेशनल साय.)एल.एल.बी.,पी.जी.डी.(लेबर लॉ एंड इण्डस्ट्रियल रिलेशन)सहित पी.एच-डी.(इन क्लीनिकल साय.), एम.बी.ए.(वित्त और मानव संसाधन) की शिक्षा प्राप्त डॉ.तिवारी का कार्य क्षेत्र-नौकरी हैl सामाजिक गतिविधि के तहत आप व्यक्तित्व विकास प्रशिक्षक,परामर्शी सहित ज्योतिष लेखन में सक्रिय हैंl इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी एवं आलेख हैl हिन्दी सहित अंग्रेजी का भाषा ज्ञान रखती हैं।